मेरा सच-चरण 25 -सुसराल मे प्रेम स्थापित करने का एक और किया प्रयास ,पर फिर रही असफल

नवंबर 2012 मे वापस सुसराल शिफ्ट होते ही मैंने भेरूजी जागरण का एक कार्यक्रम रखा।

सब रिश्तेदारों को बुलाया और ईश्वर की कृपा से बहुत अच्छा कार्यक्रम रहा।शाम को सब मेहमान अपने अपने घर चले गए,और मैं भी इस बात से बहुत खुश थी कि अब भगवान का अच्छा कार्यक्रम हो गया है,अब घर मे हम सब शांति से और खुशी से रहेंगे।लेकिन ईश्वर की परीक्षा कहाँ खत्म होती है,उसी रात को किसी बात को लेकर मेरे पति और ससुर जी  मे बहुत तेज झगड़ा हो जाता है,और झगड़ा इतना बढ़ जाता है कि पड़ोसी तक सुन लेते है।अब मुझे इतना रोना आये कि अभी अभी घर मे खुशी का कार्यक्रम हुआ और इतनी जल्दी झगड़ा हो गया।मेरे पति तो लड़ झगड़ कर सो गए पर मैं रात भर बैठी बैठी रोती रही

और भेरूजी से शिकायत करती रही कि क्यो हर समय मेरे जीवन मे कोई न कोई दुख आता रहता है।ऐसे ही मन ही मन भगवान से बाते करते करते बैठे बैठे ही आँख लग गई कि सपना आया।सपने मे एक काले घोड़े पर बड़ी बड़ी मुछो वाला,सिर पर पगड़ी बांधे,एक आदमी घुंघरू की आवाज के साथ आता है

और  और कहता है कि तू चिंता मत कर,तुझे मैंने अपने रंग मे रंग दिया है।ऐसा कह कर सपना टूट जाता है।मुझे विश्वास हो गया कि वो कोई और नहीं साक्षात भेरूजी ही थे।अब मुझे कुछ हिम्मत आई और मैंने लड़ाई की बात को भुला दिया और नई सुबह के साथ वापस जीने लगी।
लेकिन घर के लोग मुझे किसी न किसी तरह से आये दिन परेशान करते ही रहते थे।एक दिन की बात है,लाइट का बिल आया,मेरे सासुजी बिल लेकर आये मैंने अपने समिटर की रीडिंग से जो भी आया मैंने उन्हें पैसे दे दिए।लेकिन इस बार उनका कहना था कि तू प्रेस और फ्रीज जलाती है तो तुझे आधा बिल देना पड़ेगा।किसी भी तरह घर की शांति भंग न हो इसलिए उसी समय आधा बिल दे दिया।
एक दिन की बात है,मैं अपने ब्यूटी पार्लर के काम से निकल ही रही थी कि मेरी देवरानी की 9 साल की बेटी नल का बिल देकर कहती है,कि पापा ने दिया है।मैंने बिल देखा तो हँसी भी आई और गुस्सा भी आया क्योंकि बिल था केवल 165 रुपये।उसी समय मैंने वो 165 दे दिए लेकिन मैं विचार करने लगी कि कुल मिलाकर इन लोगो को मुझे परेशान ही करना हैं। 
              2 साल बाद
       मार्च 2014
जैसे तैसे  समय निकाल रही थी।एक दिन मैं ब्यूटी पार्लर के काम से गई हुई थी।मेरे पति और बच्चा घर पर अकेले थे।एक ही कमरा था,मेरा बच्चा पढ़ रहा था,और वहीं पर मेरे पति टी वी देख रहे थे।मेरे बच्चे ने अपने पापा से टी वी बंद करने को कहा तो  वो बच्चे से  लड़ने लग गए ऒर कहा कि तुझे पढ़ना है तो सीढ़ियों मे या रसोई मे जाकर पढ़,मै तो यहीं टी वी देखूंगा।मेरा बेटा भी जिद करने लगा और खुद ही टी वी बंद कर  दी।इस बात से गुस्सा होकर मेरे पति ने बच्चे को इतना मारा , कि उसने अपने आप को कमरे मे बंद कर दिया और मुझे फ़ोन लगाया।फ़ोन पर मेरा बेटा बोले कुछ नहीं, और लंबी लंबी सांसो के साथ रों रहा था।मैंने पूछा कि,बेटा-क्या हुआ तू रो क्यो रहा है।बेटे ने कांपती हुई आवाज मे कहा कि-"मम्मी आप घर जल्दी आ जाओ,मैंने कमरा अंदर से बंद कर दिया है,पापा मुझे मार रहे हैं।मेरे बेटे की आवाज सुनकर मुझे रोना आ गया।जिन ऑन्टी के  मैंं फेसिअल कर रही थी उन्होंने मुझे कहा कि-"राधा,तुम जल्दी से घर जाओ,इस वक्त  बेटे को तुम्हारी जरूरत है,उन्होंने अपना काम भी पूरा नहीं करवाया और मुझे घर भेज दिया।मैं घर आई,तो दरवाजे पर ही पति गुस्से से लालपिले होकर खड़े थे।मैं पहले चुपचाप कमरे मे गई,और अपने सहमे हुए बच्चे को लाड़ किया।मैं भी उसे गले लगाकर खूब रोइ।बच्चे को शांत किया और फिर पति से बात करी कि-"कब तक आप हमें परेशान करोगे,न तो तुम कहीं काम करते हो ,ऊपर से मुझे भी शांति से काम नहीं करने देते हो।लेकिन वो अपनी ही लगाते रहे और झगड़ा इतना बढ़ गया कि फिर कई महीनों तक हम आपस मे बिना बोले रहने लगे ।

सुसराल के सभी लोग बारी बारी से परेशान करने लगे तो एक दिन मैंने सोचा कि शायद इस घर मे रहने के मेरे संजोग ही नही है,इसीलिए बार बार कुछ न कुछ होता रहता है ।अब  बेटा 9 वी  मे आ गया था,अब उसके पढ़ने के लिए उसे एकांत  चाहिए था।ऊपर से इसी उम्र मे बच्चा अच्छा बुरा सीखता है,और मैं ऐसे लड़ाई झगड़े वाले माहौल मे उसे नहीं रखना चाहती थी।पर मै क्या करूँ,ये समझ नही आ रहा था,क्योंकि इससे पहले भी  मै 2 बार घर खाली करके जा चुकी थी।मैं रोज ईश्वर से प्रार्थना करती रहती कि अब तू ही कुछ उपाय करना।कुछ दिनों बाद मेरी ननद की बेटी की शादी तय हो गई थी।मैं वापस अपना दुःख भूलकर उसकी तैयारी करने लगी।अपने लिए,पति के लिए और बच्चे के लिए खुशी से ड्रेसेस बनवाई और शादी मे खूब एन्जॉय किया।शादी मे सुसराल के सभी लोग अच्छे से बात कर रहे थे,मेरी देवरानी भी मुझसे अच्छे से बात करने लगी तो मुझे ऐसा लगा कि अब सब अच्छे से रहेंगे,अब मैं घर छोड़ने का विचार छोड़ देती हूं।लेकिन जैसे ही शादी से फ्री होकर घर आये तो सभी जनों का वापस बिना किसी वजह से  बोलना बंद हो गया।मैंने अपनी देवरानी से पूछा कि-"तू शादी मे तो अच्छे से बोल रही थी,और अचानक घर आते ही तेरा  व्यवहार बदल  कैसे  गया ,वो बोली कि शादी मे तो लोगो के सामने अच्छा ही बोलना पड़ता है।मैं धीरे धीरे समझने लगी कि प्रेम और दिखावे मे कितना फर्क होता है।मैं एक निश्चल प्रेम की आस मे बैठी थी जो मुझे कभी वहाँ मिलने वाला नही था।
एक दिन मैं सुबह अपने काम से निकल रही थी।मुझे स्कूटी पर 20 किलो का बेग रोज carry करना पड़ता था,इसलिये मुझे मजबूरन सलवार कमीज पहन कर ही जाना पड़ता था ।उस दिन भी सलवार सूट पहन कर मैं अपना बैग गाड़ी पर रख ही रही थी कि मेरे ससुर जी मुझे देखकर बोले कि -"कैसी खानदान की आई है,सलवार सूट पहन कर गाड़ी लेकर जाती है,हमारी नाक कटवा दी  है।मैं इतनी परेशान हो गई कि एक तरफ पति खर्चा नहीं  करते ।ऊपर से घर वालो के ताने , मन बड़ा उदास था।रोज शाम को भगवान के सामने रोती।

दो चार दिन  बाद मैं किसी  ऑन्टी के फेसिअल करने गई।उस दिन मैं बहुत   उदास थी तो उन ऑन्टी ने मुझसे पूछा कि-"राधा,तुम्हे क्या परेशानी है,तुम बहुत दुःखी लग रही हो।उनकी बात सुनकर मुझे रोना आ गया,

और रोते रोते मैंने उन्हें अपनी परेशानी बताई।उन ऑन्टी ने मुझसे कहा कि राधा,मेरे एक खाली फ्लैट पड़ा हुआ है,वैसे तो बड़ा है,इसलिये किराया ज्यादा है,पर तेरे हिसाब से कम मे किराये पर दे दूँगी।अगर तेरे बच्चे की पढ़ाई का सवाल है तो थोड़ा रिस्क तो उठाना ही पड़ेगा,आखिर उसके लिए तुझे हिम्मत दिखानी पड़ेगी।उनकी बात मुझे ऐसी लग रही थी मानो ईश्वर मुझे संकेत दे रहा हो कि उस घर के माहौल से निकलना ही मेरे लिए सही कदम था।मैंने उसे ईश्वर का संकेत समझकर हाँ कर दी,और 6000 किराया फिक्स कर दिया।मेरे लिए 6000 ज्यादा ही था पर फ्लैट काफी बड़ा होने के कारण 6000 सही थे।घर आकर मैंने अपने पति से कहा कि मैंने फ्लैट फिक्स कर दिया  है तो पति गुस्सा हो गए।मैंने उन्हें कह दिया कि मैं ये रिस्क उठा कर ही रहूंगी।चाहे तुम साथ दो या नही दो।अगले दिन मैंने उन ऑन्टी से फ्लैट की चाबी ली और मैंने और बेटे ने मिलकर फ्लैट की सफाई करी।मुझे थोड़ा अंदर से डर लग रहा था ,क्योकि इससे पहले भी  मैं अपने सुसराल से दो बार निकल चुकी थी,और ये तीसरा चांस था,लेकिन मैं  भी हार  मानने वाली नहीं थी।अगले दिन मैं ओर मेरा बेटा ,हम दोनों नाथद्वारा गए,श्री नाथ जी के दर्शन करे और वहां से कृष्ण जी की मूर्ति खरीदीऔर कहा कि है कृष्ण।     !मैं आपको अपने साथ लेकर जा रही हु ।और तीसरी बार घर छोड़ रही हु,मेरे साथ रहना ओर सदा मेरी मदद करना।ये कहकर मैं मूर्ति लेकर घर आई।उसी रात को  मुझे सपना आया कि

मेरा धर्म का भाई कुणाल,जो कृष्ण के वेश मे आया और मुझे बोला कि दीदी-"मैं आपके साथ हु।"सुबह जब नींद खुली तो एक शक्ति  सी महसूस हो रही थी।मुझे उस सपने ने एक हौसला दे दिया था।ये वो तीसरा मौका था जब तीसरी बार मैंने अपने सुसराल के घर को छोडा था।हर बार मैं सुसराल के मोह जाल मे फंस जाती,और बार बार किराये के मकान से खाली करके वापस सुसराल आ जाती ।पर अब बहुत हो गया।मैंने इस बार कड़ा निश्चय कर लिया कि जहाँ बार बार अपमान का घूंट पिया है,वहाँ अब कभी नहीं आउंगी।और ईश्वर से प्रार्थना करी कि मेरे इस निश्चय को सफल बनाने मे मेरा साथ देना।इस बार मैं अकेली नही थी,श्री कृष्ण जी को साथ लेकर सुसराल की दहलीज को पार किया।

      श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी
हैं नाथ नारायण वासुदेवायः

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