संतुलन और मेरा अनुभव
संतुलन क्या है? किसी भी चीज मे एक निष्चित सीमा तक नियंत्रण करने को ही संतुलन कहते है।ईश्वर ने संसार की रचना की और मानव के हाथों इसे सौप दिया।अब मानव ने अपनी बुद्धि से इस संसार मे वस्तुओं का निमार्ण किया,शब्दों का निर्माण किया, भाषाओं का निमार्ण किया,इस प्रकार कई आविष्कार किये और विकास किए।ईश्वर ने मानव को जो बुध्दि दी उसी का प्रयोग करके इंसान ने हर चीज का विकास किया,परंतु ईश्वर ने इस प्रकति को एक स्वभाव दिया,जिसको संतुलन कहते है,जिसके ना होने पर ये ही प्रकति इंसान को अवनति की ओर ले जाती है। जब शरीर का संतुलन बिगड़ने लगता है तो शरीर हिलने लग जाता है,लड़खड़ाने लगता है,उसी प्रकार संसार की हर वस्तुओं और व्यवहार मे भी संतुलन बिगड़ने लगता है तो संसार भी हिलने लगता है। अगर इंसान बहुत कम खाये तो वो कमजोर पड़ जायेगा और अगर बहुत ज्यादा खायेगा तो बीमार हो जाएगा। अगर इंसान बहुत कम बोलेगा तो कोई उसके पास नहीं बैठेगा और अगर इंसान बहुत ज्यादा बोलेगा तो हर इंसान उससे दूर रहने की कोशिश करेगा।अगर इंसान किसी से बहुत ज्यादा व्यवहार रखेगा तो अपना सम्मान ...