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भक्ति की महिमा- सेनजी महाराज के जीवन का सच

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       सेन भक्त के जीवन का सच    बहुत समय पहले एक सेन जी महाराज नाम के व्यक्ति थे।सेन जी महाराज एक राजा के दरबार मे नोकरी करते थे।वो जाती के नाई थे,इसलिए राजा के बाल और नाखून काटते थे।उनका उबटन करके उन्हें नहलाने का काम करते थे।सेन जी महाराज श्री कृष्ण के भक्त थे।वो गृहस्थ जीवन मे रहकर भी नित्यप्रति अपने भगवान के भजन और सुमिरन किया करते थे।वो सुबह सूर्य उगने से पहले उठ जाते थे और अपने नित्य कार्य से  निवृत होकर श्री कृष्ण की पूजा आराधना करते थे।उसके बाद ही वो अपनी नोकरी पर निकल जाते थे। एक दिन की बात है,रोज की तरह ही सेन जी महाराज अपनी पूजा भक्ति के कार्य निपटा कर राजा के यहाँ जा रहे थे कि रास्ते मे एक साधु संतों की भजन मंडली मिल गई जो बहुत ही अच्छे भजन गा रहे थे।सेन जी महाराज उन भजनों को सुनकर अपने आप को रोक नहीं पाए और खुद भी उस मंडली मे शामिल होकर भजन गाने लगे।वो भजनों मे इतने मग्न हो गए कि,उन्हें ये भी याद नहीं रहा कि राजा के यहाँ  काम करने जाना है। अपने भक्त को इतना भक्ति मे डूबते हुए देखकर श्री कृष्ण स्वयं सेन जी महा...

आवरी माता की कथा

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आवरी माता की कथा     चितौड़ से कुछ किलोमीटर की दूरी पर एक आसावरा नामक गाँव है ।करीब एक हजार वर्ष पहले वहाँ जंगल था और उस जगह को आसाजी राठौड़ नाम के एक फौजदार ने बसाया थे,इसलिए उस गावँ का नाम आसावरा नाम पड़ा। आसाजी राठौड़ के सात पुत्र और एक पुत्री थी।उनकी पुत्री का नाम कुँवर केसर था।जब कुँवर केसर बड़ी हुई तो आसाजी को अपनी पुत्री के विवाह की चिंता होने लगी।उन्होंने अपनी पुत्री के लिए कई जगह वर देखे पर कोई भी कुँवर केसर से विवाह के लिए तैयार नहीं हुआ।अब तो आसाजी की चिंता बढ़ने लगी।अपने पिता को चिंतित देखकर कुँवर केसर ने अपने पिताजी को समझाया कि,पिताजी आप चिंता मत करो।आपका दुःख माँ भवानी जरूर दूर करेंगे।आसाजी राठोड़ हर समय पूजा ध्यान मे लगे रहते और अपनी कुलदेवी से प्रार्थना करते रहते।एक दिन उन्होंने अपने सातों पुत्रो को अपने पास बुलाया और कहा कि ,तुम सातों जने जाओ और अपनी बहन के लिए रिश्ता ढूंढकर आओ।अपने पिता की आज्ञा पाकर कुँवर केसर के सातों भाई अलग अलग दिशा मे निकल गए। लेकिन विधि का विधान ऐसा हुआ कि जो भी भाई जिस दिशा मे गया वहीं पर रिश्ता पक्का करके लग्न पत्रिका सौप दी। ज...

भक्त कर्मा बाई की भक्ति

कर्मा बाई की भक्ति- मीराबाई की तरह ही कर्माबाई की भक्ति की चर्चा भी बहुत सुनने को मिलती है।जहां कहीं भी भजन सत्संग होते है वहाँ कर्मा बाई का भजन अवश्य  गाया जाता है। कर्मा बाई का जन्म एक साहू परिवार मे हुआ था।उनके पिता भगवान की बहुत आराधना किया करते थे और नित्यप्रति भगवान को भोग लगाकर ही भोजन ग्रहण किया करते थे।कर्मा बाई अपने पिता को ये सब करते हुए देखती थी तो उनके अंदर भगवान के प्रति बहुत रुचि होने लगी।कर्माबाई को भगवान की कहानियां सुनने का बहुत शौक था।वो बचपन मे ही चलते फिरते भगवान के भजन गुनगुनाती रहती थी।एक बार कर्माबाई के माता पिता किसी काम से बाहर गए तो वो कर्माबाई को अपना दायित्व सौप कर गए कि वो समय पर भगवान को भोग लगा दे।कर्माबाई रोज  खिचड़ी बनाकर भगवान के सामने रख देती और उन्हें भोग लगाने के लिए बुलाती थी।कर्माबाई को यही लगता था कि भगवान असली मे आते है और भोग लगाते है,इसलिए वो तब तक भगवान के सामने बैठी रहती जब तक भगवान उसकी खिचड़ी स्वीकार नहीं कर लेते।वो तरह तरह से भगवान को अपने भजनों से रिझाती और उन्हें आमंत्रित करती थी।भगवान अपने भक्त के प्रेम को कैसे ठुकरा सकते थे,वो...

भक्त नरसी मेहता - अटूट विश्वास

नानी बाई को मायरो समय समय पर इस कल युग मे कई भक्त हुए जिन्होंने अपने विश्वास और प्रेम से श्री कृष्ण जी को पा लिया था।उन्हीं भक्तों मे से एक नरसी जी का नाम भी लिया जाता है जिन्होंने अपना सबकुछ खोकर भी ईश्वर पर पूर्ण भरोसा रखा और अंत मे साक्षात कृष्ण जी ने आकर उनका कार्य किया जो इतिहास मे नानी बाई के मायरे के नाम से प्रसिद्ध हुआ।उन्हीं नरसी जी के जीवन की ओर आपका ध्यान आकर्षित करती हूँ। नरसी जी का जन्म गुजरात के जूनागढ़ मे हुआ था।इनके पिता का नाम कृष्णदास था और माता का नाम दया कुँवर था। बाल्यावस्था मे ही नरसी जी के माता पिता का देहांत हो गया था इसलिए वो अपने बड़े भाई और भाभी के संरक्षण मे बड़े हुए।उनकी भाभी का व्यवहार उनके साथ अच्छा नहीं था।वो नित्यप्रति नरसी जी को ताने देती थी।एक दिन भाभी के तानो से परेशान होकर नरसी जी घर से निकल गए।कुछ दूरी पर एक महादेव जी का स्थान आया।उन्होंने वहां तीन दिन बिना कुछ खाये महादेव जी को याद किया और उनकी शरण मे पड़े रहे तब स्वयं महादेव जी प्रकट हुए और नरसी जी को दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा।नरसी जी ने केवल विष्णु जी के दर्शन करने की चाह प्रकट की।भोलेनाथ ...