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निंदा और तारीफ- कितना सही कितना गलत

निंदा और तारीफ-कितना सही कितना गलत ‌     जीवन के इस चक्र को जिसको स्वयं  ईश्वर ने रचा है,इसमें सही और गलत दोनो है।अच्छा है तो बुरा भी है,सुख है तो दुख भी है।सम्मान है तो अपमान भी है।वैसे तो जीवन मे तारीफ और निंदा दोनो है।अब ये हमारी अपनी बुद्धि है कि हम किसका कितना प्रयोग करते है। निंदा दो तरह की होती है।एक वो जो सामने की जाए और एक वो जो पीठ पीछे की जाए।सामने की जाने वाली निंदा  सामने वाले को जीवन के मार्ग बताती है  लेकिन पीठ पीछे करने वाली निंदा स्वयं का नुकसान करती है।पीठ पीछे वाली निंदा को पाप माना है।लेकिन कई बार सामने की जाने वाली निंदा भी स्वयं का नुकसान करती है।क्योंकि निंदा करने वाला जब अपमानजनक बात सामने वाले को कहता है तो वो सबसे पहले खुद का नुकसान करता है।इसलिए वैसे तो निंदा बहुत ही घ्रणित व्यवहार है जिस पर नियंत्रण करना ही चाहिये।जब पीठ पीछे कोई किसी की निंदा करता है तो वो खुद के पाप तो बढ़ा ही लेता है ,साथ मे सामने वाले के पाप भी अपने सिर पर चढ़ा लेता है। इंसान बहुत बढ़ा चढ़ाकर निंदा करके अपने आप को बहुत महान समझता है लेकिन वो ये नहीं जानता...