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जीवन क्या है?

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जीवन क्या है?    जीवन एक कर्मभूमि है,जीवन एक ऐसा मंच है जहाँ हर एक को अपना किरदार निभाना पड़ता है।किसी को हीरो का तो किसी को विलियन का।        एक साधारण मंच पर जब इंसान अपना अभिनय करता है तो इंसान को ये पता होता है कि वो हीरो है या विलियन।लेकिन इस जीवन के रंगमंच पर हर किरदार अपने को हीरो ही समझता है।यहाँ बुरा करने वाला भी अपने को अच्छा साबित करने की कोशिश करता है और अच्छा करने वाला भी अपने को अच्छा ही साबित करता है।इसलिए साधारण रंगमंच का परिणाम तो उसी समय आ जाता है पर जीवन के रंगमंच का कोई परिणाम नहीं आता।क्योंकि इस जीवन के रणमंच का  जो जज होता है वो  बोलकर कभी कुछ कहता ही नहीं कि आखिर सही कौन है और गलत कौन है?इंसान इस जीवन के इसी चक्र मे जीवन भर उलझता ही रहता है। जीवन इन रिश्ते नातो का एक ताना बाना है,जिसके धागों की उलझनों को निकालने के लिए वो जीवन भर प्रयास ही करता रह जाता है।हर इंसान अपने आप को एक कचहरी मे ही खड़ा पाता है।जहाँ केस कभी खत्म नहीं होते।जीवन की अंतिम सांस तक ये फाइलें चलती रहती है। जीवन रिश्ते नातों का एक ऐसा...

निंदा और तारीफ- कितना सही कितना गलत

निंदा और तारीफ-कितना सही कितना गलत ‌     जीवन के इस चक्र को जिसको स्वयं  ईश्वर ने रचा है,इसमें सही और गलत दोनो है।अच्छा है तो बुरा भी है,सुख है तो दुख भी है।सम्मान है तो अपमान भी है।वैसे तो जीवन मे तारीफ और निंदा दोनो है।अब ये हमारी अपनी बुद्धि है कि हम किसका कितना प्रयोग करते है। निंदा दो तरह की होती है।एक वो जो सामने की जाए और एक वो जो पीठ पीछे की जाए।सामने की जाने वाली निंदा  सामने वाले को जीवन के मार्ग बताती है  लेकिन पीठ पीछे करने वाली निंदा स्वयं का नुकसान करती है।पीठ पीछे वाली निंदा को पाप माना है।लेकिन कई बार सामने की जाने वाली निंदा भी स्वयं का नुकसान करती है।क्योंकि निंदा करने वाला जब अपमानजनक बात सामने वाले को कहता है तो वो सबसे पहले खुद का नुकसान करता है।इसलिए वैसे तो निंदा बहुत ही घ्रणित व्यवहार है जिस पर नियंत्रण करना ही चाहिये।जब पीठ पीछे कोई किसी की निंदा करता है तो वो खुद के पाप तो बढ़ा ही लेता है ,साथ मे सामने वाले के पाप भी अपने सिर पर चढ़ा लेता है। इंसान बहुत बढ़ा चढ़ाकर निंदा करके अपने आप को बहुत महान समझता है लेकिन वो ये नहीं जानता...