मेरा सच चरण 2- मेरे निबंध ने किया गलत का विरोध
मैं कक्षा छठी से आठवी तक मेरी सहेली के पापा के स्कूल मे पढ़ती रही,क्योकि आठवी के बाद वहां कक्षाएं नहीं थी।उस स्कूल के 2 साल मेरी जिंदगी के सबसे यादगार पल थे। सभी अध्यापक और अध्यापिकाएं मुझसे बहुत प्यार करते थे।मुझे कक्षा का मोनिटर बनाया गया।स्कूल मे कोई भी प्रोग्राम हो मै हर मे हिस्सा लेती।सुबह प्रार्थना सभा मे सबको सरस्वती वंदना से लेकर देशभक्ति गीत का पूरा 1 घण्टे का प्रोग्राम रोज होता।बहुत मजा आता था।देशभक्ति गीत की कुछ लाइन इस प्रकार थी,अगर चल सको तो स्वयंम ही चलो तुम सफलता तुम्हारे चरण चुम लेगी।दूसरा था-संग्राम जिंदगी है लड़ना तुजे पड़ेगा जो लड़ नहीं सकेगा आगे नहीं बढ़ेगा।इस प्रकार के गाने न केवल मेरे गाने तक सीमित थे बल्कि जिस भाव से मैं गाती थी वो मेरी वास्तविक जिंदगी से जुड़ गई जो मेरी आगे की कहानी मे स्वतः ही नजर आएगी।
मुझे झूठ बिल्कुल पसंद नहीं था।ना झूठ बोलना और ना ही झूठ सुनना पसंद था।गलत चाहे टीचर हो या मित्र किसी का भी बर्दाश्त नहीं करती थी।गलत का विरोध करना मेरी आदत थी।एक बार की बात है जब मैं 7वी कक्षा मे थी,और परीक्षा मे एक निबंध आया था जिसका शीर्षक था -अगर मै प्रधानाध्यापिका होती तो-मैने उस निबंध मे मेरे स्कूल की सब बुराइयां लिख दी।यहाँ तक की हर टीचर की गलतियों को उसमे लिख दिया।मुझे ये नहीं पता था कि मै क्या कर रही हु और इसका नतीजा क्या होगा बस इतना जानती थी की उस निबंध ने मुझे गलत का सामना करने का एक अवसर दिया था जिसे मैं खोना नहीं चाहती थी।जब वो कॉपी जाँची गई तो टीचर भी हैरान रह गई कि वो मुझे नंबर दे या सजा। टीचर ने वो कॉपी प्रिंसिपल के टेबल पर रख दी।पुरे स्कूल मे मेरे इस तरह के निबंध की चर्चा हो रही थी।कई टीचर मुझसे बात ही नहीं कर रहे थे क्योंकि उनकी कमियों को जो मैंने निबंध मे लिख दिया था। एक दिन प्रार्थना सभा मे प्रिंसिपल सर ने आगे बुलाकर मेरी पीठ थपथपाई और मुझे सबके सामने प्रोत्साहित किया कि इस बच्ची ने सच को कहने की हिम्मत दिखाई।सभी ने तालिया बजाई और जो टीचर मुझसे नाराज थे उन्होंने भी मुझे लाड किया।उस दिन के बाद स्कूल का वातावरण ही बदल गया।सब टीचर बहुत अच्छे से अपना उत्तरदायित्व निभाने लगे।स्कूल मे जो कमिया थी वो पूरी होने लगी और पूरा स्कूल अनुशासनबद्ध हो गया। ये एक और सबूत था ईश्वर का सत्य के साथ होने का।
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क्रमशः चरण 3
Hare Krishna Hare Krishna
ReplyDeleteयह किस्सा सभी को छोटी उम्र से ही सच बोलने की प्रेरणा देगा
ReplyDeleteबहुत अच्छा लिखा है राधा