भक्त कर्मा बाई की भक्ति
कर्मा बाई की भक्ति-
मीराबाई की तरह ही कर्माबाई की भक्ति की चर्चा भी बहुत सुनने को मिलती है।जहां कहीं भी भजन सत्संग होते है वहाँ कर्मा बाई का भजन अवश्य गाया जाता है।
कर्मा बाई का जन्म एक साहू परिवार मे हुआ था।उनके पिता भगवान की बहुत आराधना किया करते थे और नित्यप्रति भगवान को भोग लगाकर ही भोजन ग्रहण किया करते थे।कर्मा बाई अपने पिता को ये सब करते हुए देखती थी तो उनके अंदर भगवान के प्रति बहुत रुचि होने लगी।कर्माबाई को भगवान की कहानियां सुनने का बहुत शौक था।वो बचपन मे ही चलते फिरते भगवान के भजन गुनगुनाती रहती थी।एक बार कर्माबाई के माता पिता किसी काम से बाहर गए तो वो कर्माबाई को अपना दायित्व सौप कर गए कि वो समय पर भगवान को भोग लगा दे।कर्माबाई रोज खिचड़ी बनाकर भगवान के सामने रख देती और उन्हें भोग लगाने के लिए बुलाती थी।कर्माबाई को यही लगता था कि भगवान असली मे आते है और भोग लगाते है,इसलिए वो तब तक भगवान के सामने बैठी रहती जब तक भगवान उसकी खिचड़ी स्वीकार नहीं कर लेते।वो तरह तरह से भगवान को अपने भजनों से रिझाती और उन्हें आमंत्रित करती थी।भगवान अपने भक्त के प्रेम को कैसे ठुकरा सकते थे,वो रोज कर्माबाई की खिचड़ी खाने आने लगे और कुछ ही देर मे थाली मे रखी खिचड़ी गायब हो जाती।कुछ दिन बाद जब कर्माबाई के पिता वापस घर लौटे तो उन्हें ये देखकर बहुत आश्चर्य हुआ कि उनके घर मे भगवान साक्षात भोग लगाने आते है।अब तो उनके घर मे रोज का नियम हो गया कि खिचड़ी का भोग लगाने के बाद ही सभी भोजन ग्रहण करते।कुछ समय बाद कर्माबाई का विवाह एक अच्छे घर मे कर दिया।कर्माबाई के पति तेल के बहुत अच्छे व्यापारी थे।कर्माबाई के पति के अच्छे व्यापार से ईर्ष्या करके कई शत्रुओं ने उन्हें हानि पहुंचाने की कोशिश करी पर कर्माबाई की प्रभु भक्ति ने उनके पति को हर मुसीबत से बचा लिया।लेकिन फिर भी उनके पति को उनकी ये प्रभु भक्तिअच्छी नहीं लगती थी,वो पूजा पाठ और भक्ति को अंधविश्वास मानते थे।एक बार उनके पति ने उनका उपहास करते हुए कहा कि जिस भगवान की इतनी भक्ति करती हो ,क्या उसने कभी दर्शन भी दिए है तुम्हें।पति की ये बात सुनकर कर्माबाई को अपने भगवान के दर्शन करने की इच्छा जागृत हो गई और वो रोज इंतजार करती कि पता नहीं कब कृष्ण के दर्शन होंगे।
इसी तरह समय गुजर रहा था और कुछ समय बाद एक दिन उनके पति की मृत्यु हो गई।उनका बच्चा छोटा था,इसलिए अपने बच्चे को लेकर वो अपने माता पिता के घर चली गई।लेकिन अब उसका मन संसार से हट रहा था।उसको तो बस केवल कृष्ण के ही दर्शन की इच्छा थी।एक दिन आधी रात को कर्माबाई अपने बच्चे और माता पिता को छोड़कर घर से निकल गई।उसे जगन्नाथ पुरी जाना था,पर रास्ता नहीं जानती थी।केवल अपनी धुन मे चलती जा रही थी।जब काफी दूर चलने के बाद थक गई तो एक पेड़ के नीचे बैठ गई और वहीं आंख लग गई।जब दो चार घंटो बाद आंख खुली तो अपने आप को जगन्नाथ पुरी मंदिर के बाहर पाया।वो समझ गई कि ये सब उसके प्रभु की कृपा है।वो अपने साथ मे खिचड़ी लेकर आई थी और भगवान को चढ़ाने के लिए जैसे ही वो मंदिर मे जाने लगी कि वहाँ के पुजारियों ने उसे रोक लिया।जब वो बार बार जिद करने लगी तो कई लोगो ने उसे पकड़ लिया और समुंदर के किनारे फेंक दिया।कर्माबाई वहीं समुंदर के किनारे बैठकर रोने लगी और अपने भगवान को बुलाने लगी तभी बालरूप मे श्री कृष्ण जी आये और कर्माबाई की गोदी मे बैठकर खिचड़ी खाने लगे।उधर मंदिर मे जगननाथ जी की प्रतिमा गायब होने से सभी लोग बहुत परेशान हो गए।सुबह जब मंदिर के पट खुले और भगवान का पर्दा हटाया तो देखा कि भगवान की प्रतिमा वापस आ गई है और भगवान के मुँह पर खिचड़ी का दाना लगा हुआ है।मंदिर के सभी लोग समझ गए कि ये उस भक्त औरत का ही चमत्कार है।सभी ने कर्माबाई से माफी मांगी और उसको मंदिर लेकर आ गए।वहाँ के लोगो ने कर्माबाई के लिए मंदिर के पास ही कुटिया बना दी और वो वही रहने लगी।अब तो जगननाथ जी को रोज पहले कर्माबाई के हाथ की खिचड़ी का भोग लगाया जाता उसके बाद ही दूसरा कोई भोग लगता।अपने भगवान की सेवा का ये अवसर पाकर कर्माबाई धन्य हो गई और कुछ वर्ष वही बिताने के बाद एक दिन अपनी कुटिया मे ही प्राण छोड़ दिये।
कई लोग कहते है कि उनके जाने के बाद एक बच्चा 6 महीने तक उनकी कुटिया के बाहर रोता था और खिचड़ी मांगता था।शायद वो भगवान कृष्ण ही थे जो अपनी भक्त कर्मा को पुकारते थे।
धन्य है वो भक्त जिन्हें भगवान की ऐसी अध्भुत भक्ति मिलती है।कर्माबाई की एक साधारण खिचड़ी हमेशा के लिये भगवान जगन्नाथ के भोग का प्रशाद बन गया और इतिहास मे अमर हो गया।
भक्त कर्माबाई की जय हो
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