मेरा सच चरण 12- 10 वी की परीक्षा

अब तो रोज शाम को 1 घंटा सहेली के यहाँ उन sir से पढ़ने जाती। वो सर केवल पढ़ाई ही नहीं कराते बल्कि हंसी मजाक भी कराते थे। जॉक्स सुनाते थे।जॉक्स के साथ साथ बहुत अच्छे से हमें पढ़ाते थे जिससे  हमारी पढाई के प्रति रूचि बढ़ती जाती थी। 10वी कक्षा यानि कि बोर्ड की परीक्षा का उस समय बहुत ही खोफ रहता था।इसलिए मैं अपनी सहेली के साथ रोज नियम से पढाई करती थी।कभी वो मेरे घर सोती तो कभी मैं उसके घर सोती थी।रात को देरी तक पढ़ना और सुबह फिर जल्दी उठना हमारे रोज का क्रम था।उस समय 3 या 4 घण्टे की नींद ही हो पाती थी पर 10वी कक्षा अच्छे नंबर से पास होने का जुनून था जो हमें सोने नहीं  देता था।मैं और मेरी सहेली को एक दूसरे के घर रात को रुकने के लिए  हमारे पापा से न जाने कितनी  खुशामद करनी पड़ती थी तब जाकर पापा मानते।।


        मार्च 1995 को 10वी बोर्ड की परीक्षा शुरू हुई।। बहुत अच्छे से परीक्षा दी और परीक्षा ख़त्म होते ही वापस ब्यूटी पार्लर  जाने लगी।अब तो एक एक दिन बोर्ड के रिजल्ट की प्रतीक्षा थी।
जून के अंतिम सप्ताह मे रिजल्ट आया।मैं पार्लर गई हुई थी कि मेरा छोटा भाई बुलाने आया कि तेरा रिजल्ट आ गया है और सभी पडोसी तेरे रोल नंबर अखबार मे देख रहे है।सुनते ही पार्लर से दौड़ी दौड़ी घर आई।जैसे ही पहुंची कि बाहर से ही किसी पडोसी ने कहा कि राधा,मिठाई खिला ,तू तो फर्स्ट डिवीज़न से पास हुई है।।सुनते ही मैं फूली नहीं समाई और जल्दी से अपनी तसल्ली के लिए फिर से अखबार मे रोल नंबर देखे।

उसमे फर्स्ट डिवीज़न की लाइन मे मेरा नंबर देखकर मेरा मन खुश हो गया।  मैंने अपनी गुल्लक फोड़ी और रसगुल्ले लाकर पुरे मौहल्ले मे बाँटे।।सोचा था शाम को पापा ये खबर सुनेंगे तो बहुत खुश होंगे।।शाम को पापा जब आये तो मम्मी ने फर्स्ट डिवीज़न की खबर पापा को सुनाई।मैं दूर खड़ी पापा की शक्ल देख रही थी पर पापा के चेहरे पर कोई ख़ास रिएक्शन नहीं दिखा।।पापा इतने स्ट्रीक थे कि उनके मुह की प्रशंसा सुनना बहुत मुश्किल था।  चाहे कितना ही अच्छा काम कर लूं पर तारीफ़ कभी नहीं मिलती थी। उनका प्यार और उनके मुह की प्रशंसा सुनने के लिए  मेरा मन तरसता ही रहा।
    पर इसके विपरीत स्कूल मे मुझे अपने गुरुजन का बहुत प्रेम और सम्मान मिला। 10वी मे फर्स्ट डिवीज़न से  सभी टीचर बहुत खुश हुए और मुझे शाबाशी दी और आगे की अच्छी पढाई की शुभकामना दी।।। सभी पडौसी ने भी बधाई दी,पर मन के किसी कोने मे पापा के प्यार और दुलार  की कमी महसूस हो रही थी।।। पर फिर भी मेरा मन उनके अदृश्य प्रेम को महसूस कर रहा था जिसे वो जताना नहीं चाहते थे।
           उनके अदृश्य प्रेम को पहली बार तब महसूस किया जब मैं शायद 5 या 6 साल की थी।हम ननिहाल जा रहे थे।पापा स्टेशन पर हमें गाडी मै बैठाने आये।हमें गाडी मे बैठाकर वो पास की दूकान से मेरे लिए टोस्ट लेने गए क्योकि वो जानते थे कि मैं बिना टोस्ट के चाय नहीं पीती थी।अचानक गाडी चल पड़ी,पापा दौड़ते हुए काफी दूर तक गाडी के साथ दौड़ते रहे

और चलती गाड़ी मे खिड़की से मम्मी को टोस्ट का पैकेट दिया था।उस दिन पहली बार उनके अंदर के प्रेम को मैंने महसूस किया।।                           
       "सत्यम   शिवम। सुंदरम"।।

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