मेरा सच -28 -श्री कृष्ण से हुआ साक्षात्कार और भागवत गीता का हुआ मेरे जीवन मे आगमन

जून 2016 की बात है।मैं ब्यूटी पार्लर के काम से होम सर्विस पर गई हुई थी।एक दिन अचानक मेरे हाथ पैरो का बैलेंस बिगड़ने लगा।मुझे लगा शायद कमजोरी है।लेकिन ऐसा अक्सर होने लगा।कभी  खड़े खड़े गिरने जैसी हो जाती तो कभी हाथो से चीजे छूटने लगती।जब आये दिन ऐसा होने लगा तो मैंने डॉक्टर को दिखाया।

डॉक्टर  ने जांचे लिखी।मैंने सभी टेस्ट करवाये तो पता चला कि मुझे माइग्रेन है और मेरे नरवर सिस्टम बिगड़ गए है।डॉक्टर ने मेडिसिन लिखी और साथ ही मुझे ये कहा कि जब तक तुम दवाई लोगी, तब तक ये बीमारी कंट्रोल रहेगी लेकिन पूरी तरह से ठीक तभी होगी जब तुम डिप्रेशन से बाहर आओगी।
मुझे खुद को पता ही नहीं चला कब मैं घर की परिस्थितयों को सोचते सोचते डिप्रेशन का शिकार हो गई।डॉक्टर ने मुझे किसी भी तरह के इमोशनल वातावरण से दूर रहने की सलाह दी।अब मैं इतना डर गई कि अब मैं धीरे धीरे खाने पीने का भी ध्यान रखने लगी।कुछ योगा ध्यान भी करने लगी लेकिन ये मन बड़ा विचित्र होता है ,कब ये जाकर दुःखती नस पर अटैक करता है पता ही नहीं चलता।शुभम मुझे रोज अच्छी अच्छी बातें बता कर पोजेटिव करने का प्रयास करता और इस तरह समय निकल रहा था
कुछ समय बाद मुझे कुछ चमत्कारिक घटनाएं दिखने लगी।एक दिन की बात है,मैं स्कूटी से घर आ रही थी कि एक चौराहे पर पुलिस की चेकिंग चल रही थी।मेरे पास हेलमेट और लाइसेंस दोनो नही थे।मैं डर गई,कि अब क्या होगा।लेकिन उसी समय मेरी नजर उस चौराहे पर एक राडा जी के मंदिर पर पड़ी।मैंने मन मे ही उनसे विनती करी कि है प्रभु आज मुझे बचा लेना।अगर मेरी गाड़ी पकड़ ली तो कौन छुड़वायेगा, मेरा तो तेरे सिवा कोई है ही नहीं।जैसे ही पुलिस वाले मेरे पास आये और मेरे ब्यूटी care के सामान की ओर इशारा करते हुए तेज स्वर मे बोले कि, इस बैग मे क्या ले जा रही हो।मैंने भी हिम्मत करके तेज स्वर मे बोला कि ,sir, आपके पास चेक करने की मशीन है,खुद ही चेक कर लीजिए।वहाँ तीन चार पुलिसकर्मी थे ।उनमेंसे से एक ने मेरा बैग खोला ।अचानक वो पुलिसकर्मी दूसरे पुलिसकर्मी से चिल्ला कर बोला कि इन मैडम को जाने दो।उसने डरते हुए मेरे बैग की चेन बंद करी और इसके अलावा मुझसे कोई प्रश्न नहीं किया।मुझे भी ताज्जुब हुआ कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि पुलिस वाले ने मुझे न हेलमेट के लिए बोला और न ही लाइसेंस के लिए।मैं घर आ गई लेकिन ये प्रश्न मेरे मन मे कई दिनों तक चलता रहा।मेरा मन यही कह रहा था कि ये ईश्चर का ही कोई चमत्कार था।
जुलाई 2016 की बात है,एक दिन मेरी मम्मी मेरे घर आये।उस दिन मम्मी का एकादशी का उपवास था मम्मी कुछ खा नहीं रहे थे।मैंने मम्मी पर गुस्सा करते हुए कहा कि ,जब आपकी तबियत ठीक नही रहती तो क्यों उपवास करते हो।मम्मी ने मुझसे कहा कि,एकादशी का उपवास मैं नहीं छोड़ सकती,ये तो  काया के सुधार के लिए ही किया  जाता है।और हर इंसान को कम से कम महीने मे एक दिन निराहार रहना चाहिए।मुझे उनकी ये बात अच्छी लगीऔर अब मैंने भी संकल्प लिया कि अब मैं भी एकादशी जरूर करूँगी।मम्मी तो अगले दिन वापस अपने घर चले गए।पर मुझे एकादशी के प्रति रुचि जगा गए।अब तो मैं अगली एकादशी का इंतजार करने लगी।15 दिन बाद दशमी की रात को सपना आया।सपने मे देखती हूं कि एकदम सोने जैसा पीले रंग का पूरा महल था।उस महल की हर एक चीज सोने की थी ।वहां जो परदे लगे हुए थे वो भी सोने के थे।अचानक तेज हवाएं चलती है और वो पर्दे जोर जोर से उड़ने लगते है।उस पर्दे के पीछे श्री कृष्ण बांसुरी हाथ मे लिए खड़े थे

।एक बार पर्दे के पीछे छिप जाते है तो एक बार दिख जाते है।ऐसे चार पांच बार हुआ और फिर अचानक सामने आ जाते है।मैं उनको देखते ही आश्चर्य चकित हो जाती हु और उनके पास जाकर धीमे स्वर मे पूछती हु कि क्या आप ही श्री कृष्ण है?भगवान ने कहा ,हाँ मैं वही हु जिसकी तू तलाश कर रही है।

मैंने उनके चरण छुए और उन्होंने मुझसे बोला कि ,जा तू मेरे नाम का और तेरी कहानी का प्रचार कर।इतना कहा कि सपना टूट जाता है।उस समय सुबह के 5 बज रहे थे।उसी दिन एकादशी थी।मैं बहुत खुश थी कि मैंने साक्षात ईश्वर के दर्शन किये और वो भी एकादशी के दिन।उस दिन से ही मुझे कृष्ण जी से इतना लगाव हो गया कि जहाँ मैं कभी अलग अलग देवता की पूजा किया करती थी आज लग रहा था मानो मैंने हर  रूप मे बरसो से इन्ही को पूजा हो।अब मुझे हर देवता मे केवल कृष्ण ही नजर आने लगे ।अब तो जो कोई मिलता,उससे जय श्री कृष्णा  बोलकर ही बात की शुरुवात करती फिर चाहे वो बच्चा हो या बड़ा।कई लोगो को अपने सपने के बारे मे बताती तो कोई तो विश्वास करता और कोई मजाक बनाता कि ईश्वर के दर्शन कल युग मे कहाँ होते है।मेरे सच को केवल ईश्वर के अलावा कोई नही समझ सकता था।
मैं अब श्री कृष्ण की दीवानी हो चुकी थी।यही मेरे जीवन का सबसे बड़ा सच था कि मैंने साक्षात श्री कृष्ण जी को देखा जिसका अनुभव रूपी पान मैं आप सबको कराना चाहती हु।और कृष्ण जी के आदेश से आप तक ये संदेश पहुचाना चाहती हु कि कृष्ण जी कल युग मे बहुत जल्दी दर्शन देते है,बस जरूरत है केवल अटल विश्वास की ।भागवत कथा के माध्य्म से हम कृष्ण जी तक पहुंच सकते है।चारो युगों मे से केवल कल युग ही एक सरल माध्य्म है ईश्वर तक पहुंचने का,बाकी के तीनों युगों मे कठिन तपस्या के बाद भी एक जन्म मे भगवान मिल जाये,इसकी कोई गारंटी नहीं।पर कल युग मे अगर इंसान केवल सत्य की राह पर चले तो उसको इसी जन्म मे भगवान मिल जाते है,ये पक्का है।हम इंसान इस सांसारिक बंधनो में इस तरह खो जाते है कि हम हमारे असली उद्देश्य को भूल जाते है,जिसके लिये हमने जन्म लिया है।इंसान की योनि मे जन्म लेने का मुख्य उद्देश्य केवल और केवल ईश्वर की प्राप्ति है।कल युग मे भगवान को पाने के लिए कोई तप या कोई एक जगह बैठकर माला जपने की जरूरत नहीं है,केवल चलते फिरते,उठते बैठते उनको याद करके ही हम उनको प्राप्त कर सकते है।लेकिन निरंतर याद करके ही हम उन्हें पा सकते है न कि केवल दुःख मे याद करके।सुख मे भी पल पल उनको धन्यवाद देते हुए हर पल जो उन्हें स्मरण रखता है,उसे स्वयं भगवान भी याद रखते है,और वो दयानिधान हमे शीघ्र दर्शन देते है।मैने इसी सत्य रूपी ईश्वर के दर्शन के अनुभव को आप तक पहुंचाने का एक छोटा सा प्रयास अपनी कहानी के माध्यम से किया है।मेरे इस प्रयास से जितने अधिक लोगो को भगवान के दर्शन होंगे,मैं उतनी अपने आप को धन्य समझूँगी।जिसको हो गए है,वो दुसरो को भी ईश्वर के दर्शन का मार्ग बताकर अपना कल्याण करे।यही मेरा सभी से निवेदन है।और मेरे जीवन का प्रमुख उद्देश्य मुझे प्राप्त हुआ।यही मेरा सच है।।श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी,है नाथ नारायण वासुदेवाय

कुछ दिन बाद फिर एक दिन पति के बुरे  व्यवहार को याद करके मन ही मन बहुत उदास थी।किसी काम मे मन नहीं लग रहा था।मैं  और मेरा बेटा शाम को पास के एक हनुमान मंदिर मे जाकर बैठे।वहां जाते ही उनकी प्रतिमा को हाथ जोड़ते ही मेरे आँसू निकल पड़े ,कि उसी समय हनुमान जी प्रतिमा पर चढ़े हुए गुलाब के फूल एक के बाद गिरते गए।वहां मंदिर के पुजारी ने हमें वो फूल दिए और कहा कि आज हनुमान जी बहुत खुश है।

मेरे आँसू मेरे गाल पर ठहर गए और आश्चर्य से हनुमान जी को देखती रही।एक बार फिर मैंने एक चमत्कार देखा।
          "कौनसा संकट है जग मे
कपि संकट मोचन नाम तिहारो"।
           एक दिन की बात है,मैं अपने ब्यूटी पार्लर के काम से क्लाइंट के यहाँ गई हुई थी।अचानक मेरी गाड़ी मे कुछ प्रॉब्लम हो गई तो चालू नहीं हो पा रही थी।मैं बार बार स्कूटी की किक लगाती रही पर स्टार्ट ही नहीं हो रही थी।मेरा पैर गाड़ी की किक पर ही था ,और मैंने इतना ही कहा कि है प्रभु,मेरी मदद करो कि अचानक मेरे पैर पर जोर से  झटका आता है और गाड़ी अपने आप चालु हो जाती है।मैं आश्चर्य चकित हो गई कि मेरे पैर पर झटका कैसे आया।मैंने किक नहीं लगाई तो ये किक कैसे लगी?मुझे लग गया कि किसी शक्ति ने आकर मेरी गाड़ी स्टार्ट  करी है।मैं वहाँ से रवाना हुई,लेकिन पुरे रास्ते मे उस चमत्कार के बारे मे सोचती रही।घर जाकर शुभम को बताया तो शुभम ने भी आश्चर्य किया।उसके बाद मैंने अपने मिलने वालो को सबको बताया पर किसी  को  विश्वास नहीं हो रहा था।कई लोगो ने मुझे पागल कहा तो कई लोगो ने अंधविश्वास।दुनिया चाहे उस चमत्कार को अंधविश्वास समझे पर मुझे जिस चमत्कार की अनुभूति हुई उसे मैअन्धविश्वास कैसे मान सकती थी।
थोड़े दिन बीते,और एक दिन मुझे एक चमत्कार दिखा।एक दिन मैं हिरन मंगरी सेक्टर 5 मैं एक शादी का काम कर रही थी।उस दिन पता नहीं क्यों मैं अंदर ही अंदर बहुत अपसेट हो रही थी।काम करते करते भी मन मे मेरे जीवन की  बातो को लेकर कई विचार चल रहे थे।कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था।मैं करीब 5 बजे वहाँ से फ्री हुई।रास्ते मे भी स्कूटी चलाते चलाते मन ही मन बाते कर रही थी और अपने आप से ही पूछ रही थी कि आखिर क्यों मैंने सच्चाई और स्वाभिमान का रास्ता अपनाया।इस रास्ते मे तो पग पग पर केवल कठिनाइयां है।ये रास्ता तो अकेलेपन का बोध कराता है।न्याय का रास्ता अपनाकर और गलत का विरोध करते करते तो मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं कोई युद्ध लड़ रही हूं।ऐसी ही कई बातें मन मे करते करते कब मेरे आंसू गले तक पहुँच गए,पता ही नहीं चला।

तब मैंने अपनी गाड़ी रोकी और पर्स से रुमाल निकाल कर आंसू पोंछे।फिर मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना करी कि है ईश्वर मैं बहुत कमजोर पड़ रही हु,कृपया मुझे शक्ति दो।ये कह कर वापस अपनी स्कूटी स्टार्ट करी और घर की और रवाना हुई।कुछ ही दूरी पर गई कि एक चौराहे पर अचानक एक पंडित मेरी स्कूटी के आगे खड़े हो गए।   उन्होंंने मुुझे गीता की पुस्तक हाथ मे दी और बोला कि ,"मेडम,हम जगन्नाथ पुरी  से आये है और उदयपुर मे गीता का प्रचार  कर रहे है।आप ये किताब लीजिये और इसे रोज पढ़ना।आपको बहुत शान्ति और हिम्मत मिलेगी।मैंने गीता की पुस्तक हाथ मे ली और कुछ अलग ही फीलिंग्स आई।मैं वो गीता की पुस्तक घर लेकर आई,उसे भगवान् के मंदिर मे रखी।अगले दिन से मैंने उसे पढ़ना चालु कर दिया।इससे पहले मेरे घर मे दो गीता रखी हुई थी पर मैंने कभी खोलकर भी नहीं देखा।लेकिन इस बार मैंने गीता को पूरा पढ़ा।इसमें भी अर्जुन जब अपने भाइयों से युद्ध करता है तब उसी तरह उदास और कमजोर पड़ जाता है जिस तरह मैं रास्ते मे चलते हुए पड़ रही थी।तब श्री कृष्ण अर्जुन को समझाते हुए कहते है कि,है अर्जुन!जब भी अन्याय और अनीति हावी हो जाती है तब नीति और सत्य को अन्याय के खिलाफ लड़ना पड़ता है,फिर चाहे वो हमारा रिश्तेदार ही क्यों न हो।तब जाकर अर्जुन को हिम्मत आती है।जब मैंने गीता पढ़ी तो समझ आया कि वो किताब देने वाले पंडित कोई और नहीं श्री कृष्ण ही थे।


मेरे मन को बहुत ही शांति मिली कि मैं जो गलत का सामना करने  की लड़ाई लड़ रही हु वो गलत नहीं है,क्योंकि गीता यह भी कहती है कि अन्याय को चुपचाप सहन करना सबसे बड़ा पाप है।गीता के अनुसार मेरी राह सही थी,बस कठिन थी।
करीब 2 से 3 महीने मैंने गीता को पढ़ा।एक दिन की बात है,नियम के अनुसार मैं शनिवार के दिन शनिदेव के मंदिर गई हुई थी।शनिदेव को तेल चढ़ाकर मैं पास के ही एक ठाकुर जी के मंदिर मे गई।उस दिन वहाँ अन्नकूट  हुआ था।

चारो तरफ अलग अलग तरह के पकवान पड़े हुए थे लेकिन मंदिर मे उस समय केवल पंडित जी ही थे जो कुछ बिखरा सामान समेट रहे थे।मैं 15 मिनिट ठाकुर जी के सामने बैठी और उनसे कहा कि,है कृष्ण,अब मै आपको क्या बताऊँ,जो कुछ भी मेरे जीवन मे चल रहा है,उसका आपको भान है और आगे क्या होगा,वो भी आप जानो।इतना ही कहा कि ठाकुर जी के सीने पर लगा गुलाब का फूल गिर गया।
मुझे इतनी ख़ुशी हुई और वो फूल लेकर खूब उसको चूमा।मेरा विश्वास बढ़ता ही जा रहा था।
एक दिन फिर मैं और मेरा पुत्र शुभम,हम दिनों घूमते घूमते फतहसागर के पास एक  गिरधर गोपाल का मंदिर है,जो बहुत  ही प्राचीन है,वहाँ ऐसे ही चले गए।उस मंदिर मे हम पहली बार ही गए थे।मेरे बेटे ने कहा कि,मम्मी,एक भजन गाते है।उसने शुरू किया,कि,
      कौन कहते है भगवान् आते नहीं
तुम मीरा के जैसे बुलाते नहीं
इस तरह इस भजन को मैंने और शुभम ने  पूरा गाया जब उसकी अंतिम पंक्ति चल रही थी कि सबसे पहले उनके मुकुट मे लगा गुलाब का फूल नीचे गिरता है,उसके बाद उनके सीने पर लगा फूल गिरता है,और फिर एक फूल की एक एक पत्ती उनके होठो को छूते हुए ऐसे गिरती है मानो श्री कृष्ण फूलो की बारिश कर रहे हो।

ये देखकर इस बार तो मेरा रोना फुट पड़ा।मुझे ऐसा लगा कि मैं श्री कृष्णा के गले लिपटकर रो लुँ।मेरे बेटे ने मुझे गले लगाया और मुझसे बोला कि,मम्मी,आपके साथ ये है,और इनकी शरण मे जाने पर कोई चिंता नहीं रहती।आप सारी चिंता इनको दे दो।
      "ॐ भगवते वासुदेवाय नमः"।

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