मेरा सच चरण 8- पहली बार देखी भक्ति की शक्ति

2 महीने की छुट्टियां बिताकर नानाजी 1 जुलाई को वापस उदयपुर छोड़ने आते थे।आते समय नानाजी हमें पैदल नहीं लाते थे क्योंकि उस समय मै और मेरा भाई इतने  भावुक हो जाते थे कि एक एक कदम  भी भारी लगता था।ननिहाल के लोगो से बिछड़ कर आना हमारे लिए किसी दुल्हन की विदाई से कम नहीं होता था।नानाजी सुबह की सबसे पहली बस जो 6 बजे आती थी उसमें बैठाते थे।गाँव के कुछ रिश्तेदार भी बस तक छोड़ने आते थे।जैसे ही बस आती कि हमारा रोना फुट पड़ता।

मेरे नानाजी हाथ खींच कर जबर्दस्ती बस मे बिठाते और हम पीछे रह गई हमारी नानी को तब तक देखते रहते थे जब तक  वो आँखों से ओजल न हो जाए।पूरी बस के लोग हमारे इस दृश्य को देखकर हैरान हो जाते कि  कितना गहरा प्यार है इनका अपने नाना नानी से।। यहाँ तक कि निशानी के तौर पर मै नानाजी के खेत का एक पत्थर या एक लकड़ी का टुकड़ा साथ मे लेकर आती  जिसे घर जाकर उसे पॉलीथिन चढ़ाकर रोज उसको छू कर नाना नानी को महसूस करते थे।जैसे ही उदयपुर आ जाता कि मन और मस्तिष्क पर एक सन्नाटा छा जाता।घर पर आने के बाद एक सप्ताह मोन रहते,न किसी से बात करते थे,ना ही किसी मे मन लगता था। बड़ी मुश्किल से 15 से 20 दिन सामान्य होने मे लग जाते।।पिपलाज माता जी की तस्वीर के आगे रोज हाथ जोड़कर विनती करते कि कब नवरात्रि आएगी और हमें नाना नानी के यहाँ जाने का अवसर मिलेगा क्योकि गर्मी की छुट्टियों के बाद नवरात्रि मे एक बार वापस ननिहाल जाने का मौका मिलता था।   

       

   एक बार की बात है, जब मै 7वी कक्षा मे थी और मेरा नवरात्रि का व्रत था।मुझे मीठा खाने का बहुत शौक था।पड़ोस मे किसी की शादी थी तो वहां से मीठी बूंदी आई हुई थी।मैं भूल गई कि मेरा व्रत है और चार पांच मुट्ठी खा गई।थोड़ी देर बाद मम्मी ने बोला कि ये क्या किया तूने?व्रत तोड़ दिया!अब तेरी रोटी डूब जायेगी।।रोटी डूबने का मतलब ये था कि व्रत के  अंतिम दिन किसी तालाब या कुंड मे एक रोटी बनाकर पानी मे छोड़ते थे।।ऐसा माना जाता था कि जिसने व्रत का अच्छे से पालन किया होगा उसकी रोटी पानी मे तैरेगी और जिसने व्रत भंग किया होगा उसकी रोटी पानी मे डूबेगी।।इस मान्यता के अनुसार ही मम्मी ने मेरे व्रत टूटने पर ,रोटी डूबने वाली बात कही।।।  मम्मी की बात सुनकर मै चिंता मे आ गई कि अगर मेरी रोटी डूब गई तो सब हँसेंगे।।उस दिन मेरा नवरात्रि का दूसरा ही व्रत था। मै पूरी नवरात्रि मातारानी के सामने बैठकर यही कहती  रही कि मुझे माफ़ कर देना जो मैंने गलती से बूंदी खा ली,पर कृपया मेरी रोटी मत डुबाना।।इस तरह नवरात्रि का अंतिम दिन भी आ गया।।उस दिन पूजा के लिए जा रहे थे तब मन मे कोई ख़ुशी नहीं थी बल्कि रोटी डूबने का डर लग रहा था,पर माता जी को मन ही मन याद कर रही थी। मम्मी ने पूजा करवाई और फिर रोटी लेकर डरते डरते धीरे से पानी मे छोड़ी।।और अटूट आस्था ने चमत्कार दिखाया कि रोटी तब तक नहीं डूबी जब तक वो पानी मे पूरी तरह गल न गई।यहाँ तक कि पानी मे वो रोटी बहुत दूर तक तैरती रही।
  वास्तव मे भक्ति मे शक्ति होती है ये मैंने प्रत्यक्ष देखा है।।राम का नाम लेने मात्र से पत्थर पानी मे तैर सकता है तो मेरी रोटी क्यों नहीं ?

    "सत्यम   शिवम्।  सुंदरम"।।

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