वरदा जी एवं लाली बाई ---ऊंची सोच
वरदा जी मेरे नाना जी और लाली बाई मेरी नानी जी है।इन दोनों के बारे मे तो क्या कहूं, प्रेम के सागर थे ये।मेरे नाना जी पिपलाज माता जी के परम भक्त थे,बचपन से लेकर मरने तक इन्होंने अपने पैरों मे कभी जूते नहीं पहने।इनके तीन बेटियां ही है,बेटा नहीं है,लेकिन फिर भी उस जमाने मे जहाँ लड़को के लिए लोग तरसते थे,तब भी इन्होनें कभी अपने मन पर नकारात्मकता का भाव नहीं आने दिया।लोगो के कहने पर भी शान से कहते थे कि कौन कहता है मेरे बेटा नहीं है,मेरे एक नही तीन बेटे है।जो बेटियां है,वो ही मेरे बेटे है।और वाकई मे जैसा वो कहते थे,वैसा ही हुआ।तीनो बेटियों ने जो अपने माँ बाप को कभी बेटे की कमी महसूस ही नहीं होने दी।शादी के बाद भी तीनो बेटियों ने अपने माँ बाप को कभी अकेला नहीं छोड़ा।बारी बारी से तीनों बेटियां माता पिता को संभालती रही,शायद ये मेरे नानाजी की सकारात्मक सोच का ही परिणाम थी।उनकी वाणी मे इतना तेज था कि बीमार आदमी भी उनके सामने जाता और वो कह देते कि अभी ठीक हो जाएगा तो वो उसी समय ठीक हो जाता था।उनके सामने बड़ी से बड़ी समस्या मैंने हल होते हुए अपनी आंखों से देखी है।इसलिए आये दिन लोग अपनी परेशानियां लेकर उनके पास आते थे।वो आधी रात मे भी लोगो की परेशानियां हल करने उनके घर चले जाते थे।अगर गाँव मे किसी की गाय या भैंस भी बीमार हो जाती और नाना जी जाकर उसके ऊपर हाथ घुमाते तो वो तुरंत ठीक हो जाती और घास खाने लग जाती।ये सब उनकी भक्ति और विश्वास का ही चमत्कार था।
नानी जी भी बहुत प्यारी थी।नानी जी भोली तो थी ही साथ ही शर्मीली इतनी थी कि कभी अपना चेहरा किसी को नहीं दिखाती थी।वो अधिकतर घूंघट मे ही रहती थी।हम बच्चे भी उनकी शक्ल कभी कभार देख पाते थे,लेकिन गाँव के कई लोगो ने तो उनकी शक्ल जीवन भर नही देखी।जब उनका अंतिम संस्कार हुआ था,तब लोगो ने उनका चेहरा देखा था।उनकी बोली मे इतनी मिठास थी कि कोई भी उनका दीवाना हो जाता।बड़ो से लेकर बच्चे तक से वो बहुत प्यार से बात करती थी।जब हम नवरात्रि मे नाना के यहाँ जाते थे तो नानी जी कई दिनों पहले से ही हमारे आने की तैयारिया करती थी,आंगन को गोबर और मिट्टी से लिपकर रखती थी।
एक छोटा सा केलू का कमरा था,जिसमे हम 15 से 20 जने नवरात्रि मे रहते थे।नानी जी हम सबको चिमनी के उजाले मे ही खाना बनाकर खिलाती थी,फिर पूरी पूरी रात जाग जाग कर हमें चादर ओढाती रहती और ध्यान रखती रहती थी।1999 मे जब मेरा बेटा हुआ तो मेरी नानी जी मेरे पास रहने के लिए आई थी,उन दिनों मेरे बी ए सेकंड ईयर की परीक्षा चल रही थी और मेरा बेटा मात्र 15 दिन का ही था।वो रात भर बहुत रोता था और मुझे पढ़ना होता था,इसलिए मेरे नानी रात भर उसको गोदी ले लेकर उसको चुप कराते रहते थे,पर कभी उन्होंने गुस्सा नहीं किया।रात मे बार बार जागने के बावजूद भी वो इतने प्यार से बोलती थी कि जैसे उन्हें कुछ करना ही नहीं पड़ रहा हो।मेरे नाना और नानी दोनो ही गावँ की शोभा थे।वो जब इस दुनिया से गये तो उनको जलाया नहीं, बल्कि उनके घर के पास ही उन्हीं के खेत मे उनको दफनाया गया और आज दोनो की समाधि बनी हुई है,ओर ये काम उनकी तीनों बेटियों ने किया।सारा समाज जहाँ उनके मरण पर जोर जोर से दिखावे और रिवाजो का रोना रो रहा था वहीं उनकी तीनो बेटियां अपने दिल पर पत्थर रखकर,धैर्य के साथ अपने माता पिता को भजन गा कर विदा कर रही थी,क्योंकि मेरे नाना जी ने तीनों बेटियों से वचन लिया था कि उनके मरने पर कोई आंसू न बहाए,इसलिए तीनो बेटियों ने अपने पिता के वचनों का पालन किया।उस जमाने मे जहाँ लोग बेटे के लिए तरसते थे,वहाँ मेरे नाना नानी ने अपनी तीनो बेटियों को बेटा मानकर जो अद्धभुत उदहारण दिया,उसके लिए शब्द नहीं है मेरे पास।और इन तीनो बेटियों ने भी जो फर्ज निभाया अपने माता पिता के लिए वो बेटो से कहीं ज्यादा निभाया।
मेरे नाना जी की कही गई कुछ पंक्तियों के साथ अपनी बात खत्म करती हूं-------
एक छोटा सा केलू का कमरा था,जिसमे हम 15 से 20 जने नवरात्रि मे रहते थे।नानी जी हम सबको चिमनी के उजाले मे ही खाना बनाकर खिलाती थी,फिर पूरी पूरी रात जाग जाग कर हमें चादर ओढाती रहती और ध्यान रखती रहती थी।1999 मे जब मेरा बेटा हुआ तो मेरी नानी जी मेरे पास रहने के लिए आई थी,उन दिनों मेरे बी ए सेकंड ईयर की परीक्षा चल रही थी और मेरा बेटा मात्र 15 दिन का ही था।वो रात भर बहुत रोता था और मुझे पढ़ना होता था,इसलिए मेरे नानी रात भर उसको गोदी ले लेकर उसको चुप कराते रहते थे,पर कभी उन्होंने गुस्सा नहीं किया।रात मे बार बार जागने के बावजूद भी वो इतने प्यार से बोलती थी कि जैसे उन्हें कुछ करना ही नहीं पड़ रहा हो।मेरे नाना और नानी दोनो ही गावँ की शोभा थे।वो जब इस दुनिया से गये तो उनको जलाया नहीं, बल्कि उनके घर के पास ही उन्हीं के खेत मे उनको दफनाया गया और आज दोनो की समाधि बनी हुई है,ओर ये काम उनकी तीनों बेटियों ने किया।सारा समाज जहाँ उनके मरण पर जोर जोर से दिखावे और रिवाजो का रोना रो रहा था वहीं उनकी तीनो बेटियां अपने दिल पर पत्थर रखकर,धैर्य के साथ अपने माता पिता को भजन गा कर विदा कर रही थी,क्योंकि मेरे नाना जी ने तीनों बेटियों से वचन लिया था कि उनके मरने पर कोई आंसू न बहाए,इसलिए तीनो बेटियों ने अपने पिता के वचनों का पालन किया।उस जमाने मे जहाँ लोग बेटे के लिए तरसते थे,वहाँ मेरे नाना नानी ने अपनी तीनो बेटियों को बेटा मानकर जो अद्धभुत उदहारण दिया,उसके लिए शब्द नहीं है मेरे पास।और इन तीनो बेटियों ने भी जो फर्ज निभाया अपने माता पिता के लिए वो बेटो से कहीं ज्यादा निभाया।
जरूरी नहीं की एक पुत्र ही वंश को आगे बढ़ाता है,अगर ऐसी पुत्रिया हो तो केवल वंश ही आगे नहीं बढ़ता बल्कि उस वंश को इतिहास के पन्नो पर ऐसे लिख दिया जाता है ,कि फिर कभी उस वंश का अंत ही नहीं होता,फिर चाहे कोई बेटा पैदा हो या ना हो।उस वंश का नाम ही अमर हो जाता है।
उस जमाने मे मेरे नानाजी की इस सोच को मैं शत शत प्रणाम करती हूं ,जो समाज के उन लोगो के लिए एक उदाहरण है,जो आज भी बेटो के लिए तरसते है।
धन्य है मेरे नाना नानी और उनकी बेटियाँ। मेरे नाना जी की कही गई कुछ पंक्तियों के साथ अपनी बात खत्म करती हूं-------
गया फूल थारी रह गई रे वासना
रह गयो रे अमर नाम
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