मेरा सच-चरण 16 -सुसराल की प्रथम सीढ़ी

5 मई 1998 को सुसराल की दहलीज पर पहला कदम था। नए जीवन मे बहुत सी आशाएं थी,


मैं एक अच्छी पत्नी,एक अच्छी बहु ,एक अच्छी भाभी बनना चाहती थी।मन मे धारणा बना कर गई थीं कि सुसराल मे सबका सम्मान करुँगी,सबको समय से खाना बना कर दूंगी और सबको खुश रखूंगी पर गलत का सामना करने का जो स्वभाव था,उस स्वभाव ने मुझे सुसराल मे एक  अच्छी बहु नहीं बनने दिया।सत्य का साथ देना और अन्याय का विरोध करना मेरा कर्म था जिसे अपनी पूरी जीन्दगी मे हर दुःख सहन करके भी मैंने निभाया।
               सुसराल मे जाने के अगले दिन से ही मेरे संघर्ष की कहानी शुरू हो गई।मेरे दहेज़ के सामान को खोलकर   मेरे मायके वालों का अपमान किया


और सासु जी ने  मुझसे कहा कि क्या दहेज़ दिया तेरे बाप ने,सास और ननद के पांच ड्रेस तो रिवाज है तेरे बाप ने तो एक भी नहीं दी।अलमारी के साथ पेटी तो चाहिए थी,इस तरह की अपमानजनक बाते सुनकर मेरी तो एक ही दिन मे ऐसी हालत हो गई मानो मै कही अँधेरे कुएं मे गिर गई हूँ। ।मुझे पहली बार अहसास हुआ कि सुसराल की एबीसीडी क्या होती है? अपने मन को बड़ी मुश्किल से काबू मे रखे हुए था कि अगर मै पहली बार मे ही कुछ बोल गई तो लोग क्या कहेंगे? करीब एक सप्ताह बीता और एक सप्ताह के बाद पगफेरे के लिए पीहर से भाई और पुफाजी लेने आये।मैं उनके साथ वापस अपने पीहर गई।परंपरा के अनुसार तो पहली बार पीहर जाते समय सुसराल से नई साडी पहन कर बहु अपने पीहर जाती है पर मुझे उसी पीहर की साडी मे वापस भेज देते है।मै जैसे ही पीहर पहुँचती हूं कि मुझे उसी साडी मे देखकर,जिसमे पापा ने विदा करा था,देखकर पापा बहुत गुस्सा हो गए और कहने लगे कि तेरी  सास क्या इतना भी नहीं जानती कि पहली बार उनकी तरफ की साडी मे पीहर भेजा जाता है। मै दोनों पक्षो की तुच्छ बाते सुनकर घबरा रही थी कि आखिर   क्यों लोग लेनदेन की छोटी  बाते करते हैं।मुझे न तो सुसराल वालो की बाते अच्छी लग रही थी और न ही पापा की। मुझे तो इन सबसे परे निस्वार्थ प्रेम को अपने जीवन मे लाना चाहती थी पर इस दुनिया मे ऐसे प्रेम को पाना और किसी को समझाना बहुत मुश्किल था।। 
जैसे तैसे पापा के गुस्से को मम्मी ने शांत किया और दो तीन दिन पीहर रुकी और फिर वापस से मेरे पति मुझे लेने आये। मैं वापस अपने सुसराल आई और  रहने लगी।मेरे पति छोटी मोटी  हेयर कटिंग की दुकान पर काम करते थे।

सासुजी नर्स के पद पर सरकारी नोकरी करते थे जो आस पास किसी गाँव मे थी। एक सप्ताह  बाहर रहते तो एक सप्ताह यहाँ रहते।घूंघट को लेकर आये दिन मुझे खरी खोटी सुनाते थे। जान बूझकर सुबह 4 बजे से जोर जोर से आवाज लगा कर मुझे उठा देते थे। 5 बजे नल आते थे,लंबा घूंघट निकालकर पानी भरना पड़ता था,कई बार तो मै घूंघट मे पानी का घड़ा उठाते उठाते गिर जाती थी

पर चाहे मै गिरू या पडू घूँघट नहीं हटना चाहिए।मै अपने पति से बहुत प्रेम करती थी और हमेशा उनसे यही कहती कि मुझे धन दौलत,कपडे,गहने किसी का मोह नहीं पर प्रेम सच्चा होना चाहिए।लेकिन कुछ समय बीतने पर पता चला कि उस घर मे तो केवल लोग पैसो से ही प्रेम करते है ।छोटा परिवार और सरकारी नोकरी,सुसराजी के घर की दूकान होते हुए भी एक एक चीज के लिए वहां लोग एक दूसरे से लड़ते थे।कहाँ मैं एक निश्छल प्रेम की आस लेकर आई और कहाँ मै एक अजीब सी विचारधारा वाले स्वार्थी लोगो के बीच फंस गई। 
       शायद ये मेरी सच्चाई और स्वाभिमानी की कठोर परीक्षा थी,कैसे आगे आगे मैं इन परिस्थितियों से लड़ी और कैसे ईश्वर ने मुझे पग पग पर हिम्मत दी,

मेरी आगे की कहानी से जुड़े रहिये।

          "सत्यम।  शिवम।  सुंदरम"।।

Comments

Popular posts from this blog

भक्त नरसी मेहता - अटूट विश्वास

एक सत्य कहानी-बापकर्मी या आपकर्मी

भक्ति की महिमा- सेनजी महाराज के जीवन का सच