मेरा सच चरण 3- बचपन की सगाई

बात उसी समय की है जब मैं 7वी कक्षा मे पढ़ती थी।एक दिन मम्मी और पापा गाँव गए हुए थे।मैं और मेरे भाई बहन घर पर अकेले थे।शाम का समय था,मैं चूल्हे पर खाना बना रही थी कि अचानक फाटक बजी,कोई अतिथि दरवाजे पर खड़े थे लेकिन मैं नहीं पहचानती थी।मैने उनका नाम पूछा तो उन्होंने अपना नाम बताया और कहा कि मैं आपके पापा से मिलने आया हु।मैने आदर सहित अंदर बुलाया पर क्योकि घर मे मम्मी पापा नहीं थे तो मैंने उन्हें बाहर बरामदे मे ही कुर्सी लगाकर बिठाया।मुझसे उन्होंने बहुत से प्रश्न किये और कई बातें करी। मैंने उन्हें चाय पिलाई और फिर वो चले गए।जब रात को मम्मी पापा आये तो मैंने उन्हें उन अथिति के बारे मे बताया तो पापा ने कहा कि वो तो तुझे ही देखने आये थे अपने लड़के के लिये।थोड़े दिन बाद एक दिन वो वापस से आये और पापा को कह दिया कि हमें आपकी लड़की पसंद है।बस फिर क्या था,मात्र 12 वर्ष मे ही मेरी सगाई हो गई।मैंने लड़के को नहीं देखा और लड़के ने भी मुझे नहीं देखा। मुझे नहीं पता था कि सगाई क्या होती है मैं तो सिर्फ प्रेम की दीवानी थी।सास ससुर अकसर घर पर आते रहते थे तो मुझे उनसे कब इतना लगाव और प्रेम हो गया पता ही न चला।
उस समय हमारा मकान बहुत छोटा था। एक कमरा और एक छोटी सी रसोई थी जिसमे मैं और मेरा छोटा भाई पढाई करते थे।टॉयलेट बाथरूम कुछ नहीं थे।शौच के लिए बाहर जाते थे और नहाने के लिए घर के पीछे एक खाली जगह पर एक पत्थर रखा हुआ था जिस पर बैठ कर नहाते थे।मुझे खुले मे शौच करने मे और बाहर खुले मे नहाने मे बहुत शर्म आती थी इसलिए मैं इसी डर से सुबह जल्दी उठकर शौच और स्नान से निवृत्त हो जाती थी ।मुझे पढ़ने का बहुत शौक था ,पर घर छोटा था,छोटे भाई बहन मस्ती करते थे,आये दिन कोई न कोई गाँव से मेहमान आते थे  लेकिन पढ़ने की रूचि के कारण इन सब चीजों का मुझ पर कोई फर्क नहीं पड़ा।मैं छत पर जाकर एक छोटी हल्की लाइट के उजाले मे पढाई करती थी।मै हमेशा 3 बजे उठकर पढ़ती थी क्योकि उस समय बिल्कुल शांत माहौल होता था। 3 से 5 पढ़ने के बाद मैं 5 बजे शौच के लिए चली जाती थी।हालांकि घर के पास ही शमसान था,पर उस समय पता नहीं क्यों कभी डर ही नहीं लगा।शौच से आने के बाद नहाती और फिर चूल्हा लगाकर खाना बनाती।मैं चाहती थी की मम्मी के उठने से पहले सारा काम हो जाये । मम्मी पापा बहुत मेहनत करते थे तो मुझे उनकी बहुत चिंता थी।पर मैं चाहे कितना ही अच्छा पढ़ लू या घर का सारा काम भी कर लूं फिर भी मुझे वो प्यार नहीं मिलता।पापा बहुत स्ट्रीक थे वो हर बात बात पर मुझे डांटते रहते थे।वो जितना डांटते मैं हर बार उन्हें खुश करने का बार बार प्रयास करती।पापा का डर तो इतना था कि कभी उनकी आँख की तरफ देखकर तो हमने कभी बात ही नहीं करी।पर मेरा यही उद्देश्य था कि मै हमेशा सबको खुश रखु। 7 बजे मैं स्कूल चली जाती।स्कूल  मे भी मेरी पूरी जिम्मेदारी होती थी कि प्रार्थना सभा की पूरी तैयारी मै ही करू।कक्षा मे टेबल कुर्सी को व्यवस्थित रखना,टीचर की कुर्सी पर चोक,और डस्टर रखना ये सब मुझे ही करना होता था। 2 बजे स्कूल की छुट्टी होती थी।घर जाने के बाद  खाना खाती और फिर थोड़ी देर  कॉमिक्स पढ़ती।उसके बाद होम वर्क करती।पढ़ाई का नियम रोज एक जैसा था जो स्कूल मे पढ़ाया वो उसी दिन याद करना मेरा नियम था। शाम को 1 घंटा भगवान् के भजन करती थी।अपने जीवन को बचपन से ही  योजनाबद्ध करके चलना भगवान् का उपहार था मेरे लिए। मेरी मम्मी लोगो के घर पानी भरते थे जिसमे एक घड़े के 1 रुपैया लेती थी।


उनकी इस तरह की परिस्थति को देखकर मैंने कभी किसी चीज के लिए ज़िद नहीं करी। मैं बहुत ही भावुक थी ,हर किसी पर मुझे बहुत जल्दी दया आ जाती थी मेरी भावुकता ,मेरा प्रेम ,मेरी समय बद्धत्ता, कार्य के प्रत्ति उत्साह,ईमानदारी ये सब उस ईश्वर की बहुत बड़ी देंन थी जिस पर मुझे अटूट भरोसा था।। 

सत्यम शिवम सुंदरम

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