मेरा सच,चरण 31- सत्य और गीता से हुआ गहरा परिचय
गीता की एक और बात मेरे जीवन को पूरी तरह से प्रभावित कर चुकी थी।
समय परिवर्तनशील है।जो आज तुम्हारा है वो कल किसी और का होगा।जिसे तुम अपना समझ रहे हो वो ही तुम्हारे दुःख का कारण है।
वास्तव मे मैंने जिसे अपना समझा,जिनसे अत्यधिक प्रेम किया,वो सब ही मेरे दुःख का कारण बने।
गीता का एक और श्लोक कहता है कि किसी से अपेक्षा मत रखो यानी उम्मीद मत रखो।कर्म करो,उसके फल की आशा मत रखो।तुम क्या लाये थे जो तुमने खो दिया।मान, अपमान,अपना पराया,सब भूल कर केवल वर्तमान मे रहकर अपना कार्य करो।
आज ईश्वर को तहे दिल से लाख लाख धन्यवाद देती हूं कि उन्होंने मुझे मेरे ही जीवन से अनुभव करा कर मुझे पूरी गीता समझा दी।
बस फिर क्या था,अब तो मेरे जीवन का चक्र ही बदल गया।मैंने लोगो से,अपनो से उम्मीद करना छोड़ दिया,पीठ पीछे किसी की बात करना बंद कर दिया।अपना फर्ज और प्रेम निभाती पर वापस बदले मे प्रेम की आशा रखना बंद कर दिया।धीरे धीरे मैं निंदा और बुराइयों से मुक्त होती जा रही थी।मुझे बहुत हल्का महसूस होने लगा।अब तो मैंने अपने दिनचर्या को भी व्यवस्थित कर लिया।सुबह जल्दी उठकर योगा,प्राणायाम और मेडिटेशन से अपने दिन की शुरुवात करने लगी।अपने हर एक क्षण का उपयोग करने लगी।जिससे मुझे अब बहुत ही अच्छा लगने लगे गया।किसी से कोई शिकवा नही,जो भी होता,अच्छा या बुरा,उसे ईश्वर की मरझी समझकर स्वीकार करने लगी।
अगस्त 2019 की बात है।
एक रात मुझे सपना आया।सपने मे मैं और मेरा पुत्र शुभम, हम दोनों किसी मंदिर मे दर्शन के लिए गए।वहाँ पर कृष्ण जी की एक बहुत बड़ी मूर्ति थी।मूर्ति के ऊपर तक की ही छत थी और बाकी का पूरा पांडाल खुला था,जिस पर छत नही थी।मैं और शुभम उस पांडाल से दूर से दर्शन कर रहे थे,क्योंकि बहुत भीड़ थी।फिर सारे लोग उस पांडाल मे नीचे बैठ गए क्योंकि वहाँ सत्संग चालू होने वाला था।हम भी नीचे बैठ गए।मेरे बिल्कुल बगल मे मेरे स्वर्गवासी सासुजी बैठी हुई थी और बहुत प्यार से मेरी और देख रही थी।थोड़ी देर मे मैंने देखा कि मूर्ति से बहुत सारे फूल गिर रहे थे।मैंने ध्यान से देखा कि आखिर ये फूल कैसे गिर रहे है,तो मुझे नजर आया कि मूर्ति के ऊपर बहुत सारे छोटे बच्चो के हाथ निकल रहे थे जो मूर्ति से फूल नीचे गिरा रहे थे।मैने भगवान से मन ही मन बात करी और गुस्सा किया कि,है भगवान ये तो आपके मंदिर की चालाकी है,जो मुझ जैसे भोले लोगो को बेवकूफ बनाते है।मैं तो इतने समय से यही समझती थी कि,आप सच मे फूल देते हो पर आज पता चल गया कि ये सब नकली था,और मैं मन ही मन भगवान से नाराज हो गई।
तभी अचानक आकाश से बड़े बड़े फूल आकर मेरी गोदी मे गिरते है।उनमें से एक बड़ा फूल पास ही बैठे मेरे स्वर्गवासी सासुजी मुझे देते है और कहते है कि देख राधा,ये फूल आकाश से गिर रहे है,यानी सीधे भगवान के घर से आ रहे है।ये सब असली है,सच्चे है।
उनकी बात सुनकर मेरी और शुभम की आंखों से आंसू बहने लगे।वहाँ बैठे सभी भक्तजन भी रोने लगते है।सभी साँवरिया सेठ की जय बोलते है और तभी मेरे सासुजी अचानक गायब हो जाते है और मेरा सपना भी टूट जाता है।
जब मेरा सपना टूटा और मेरी आँख खुली तो असली मे मेरी आंखे गीली थी और ,मैंने उठकर भगवान को प्रणाम किया और इतने सुंदर सपने के लिए उन्हें धन्यवाद दिया ।आज तक मुझे
जितने भी चमत्कारिक सपने आये,वो सभी सपने सुबह के 4 से 5 के बीच ही आये।और माना जाता है कि सुबह के सपनो का कोई न कोई महत्व जरूर होता है और मुझे वो सारे सपने ईश्वर के साथ होने का प्रमाण दे रहे थे।वो सत्य रूपी ईश्वर मेरे सत्य मे मेरे साथ था।एक पल के लिए भी ईश्वर ने मुझे नहीं छोड़ा और एक पल के लिए भी मैंने ईश्वर को नहीं छोड़ा।चाहे सुख आया हो चाहे दुःख, उनके नाम का स्मरण उठते बैठते,जागते सोते,चलते फिरते,हर समय चलता रहता था।यहाँ तक कि स्कूटी चलाते समय भी कई बार मैं उनकी स्मृतियों मे इस कदर खो जाती कि मुझे स्वयं को नहीं पता होता कि मैं किस रास्ते से घर तक आई हूं।कई बार तो मुझे लगता कि मेरा शरीर अलग है और उसके अंदर की आत्मा अलग है।सारे कार्य वो अप्रत्यक्ष आत्मा ही कर रही थी जिसे मैं अगर अपने अनुभवों से ईश्वर कहु तो भी कोई गलत नहीं।
समय परिवर्तनशील है।जो आज तुम्हारा है वो कल किसी और का होगा।जिसे तुम अपना समझ रहे हो वो ही तुम्हारे दुःख का कारण है।
वास्तव मे मैंने जिसे अपना समझा,जिनसे अत्यधिक प्रेम किया,वो सब ही मेरे दुःख का कारण बने।
गीता का एक और श्लोक कहता है कि किसी से अपेक्षा मत रखो यानी उम्मीद मत रखो।कर्म करो,उसके फल की आशा मत रखो।तुम क्या लाये थे जो तुमने खो दिया।मान, अपमान,अपना पराया,सब भूल कर केवल वर्तमान मे रहकर अपना कार्य करो।
आज ईश्वर को तहे दिल से लाख लाख धन्यवाद देती हूं कि उन्होंने मुझे मेरे ही जीवन से अनुभव करा कर मुझे पूरी गीता समझा दी।
बस फिर क्या था,अब तो मेरे जीवन का चक्र ही बदल गया।मैंने लोगो से,अपनो से उम्मीद करना छोड़ दिया,पीठ पीछे किसी की बात करना बंद कर दिया।अपना फर्ज और प्रेम निभाती पर वापस बदले मे प्रेम की आशा रखना बंद कर दिया।धीरे धीरे मैं निंदा और बुराइयों से मुक्त होती जा रही थी।मुझे बहुत हल्का महसूस होने लगा।अब तो मैंने अपने दिनचर्या को भी व्यवस्थित कर लिया।सुबह जल्दी उठकर योगा,प्राणायाम और मेडिटेशन से अपने दिन की शुरुवात करने लगी।अपने हर एक क्षण का उपयोग करने लगी।जिससे मुझे अब बहुत ही अच्छा लगने लगे गया।किसी से कोई शिकवा नही,जो भी होता,अच्छा या बुरा,उसे ईश्वर की मरझी समझकर स्वीकार करने लगी।
अगस्त 2019 की बात है।
एक रात मुझे सपना आया।सपने मे मैं और मेरा पुत्र शुभम, हम दोनों किसी मंदिर मे दर्शन के लिए गए।वहाँ पर कृष्ण जी की एक बहुत बड़ी मूर्ति थी।मूर्ति के ऊपर तक की ही छत थी और बाकी का पूरा पांडाल खुला था,जिस पर छत नही थी।मैं और शुभम उस पांडाल से दूर से दर्शन कर रहे थे,क्योंकि बहुत भीड़ थी।फिर सारे लोग उस पांडाल मे नीचे बैठ गए क्योंकि वहाँ सत्संग चालू होने वाला था।हम भी नीचे बैठ गए।मेरे बिल्कुल बगल मे मेरे स्वर्गवासी सासुजी बैठी हुई थी और बहुत प्यार से मेरी और देख रही थी।थोड़ी देर मे मैंने देखा कि मूर्ति से बहुत सारे फूल गिर रहे थे।मैंने ध्यान से देखा कि आखिर ये फूल कैसे गिर रहे है,तो मुझे नजर आया कि मूर्ति के ऊपर बहुत सारे छोटे बच्चो के हाथ निकल रहे थे जो मूर्ति से फूल नीचे गिरा रहे थे।मैने भगवान से मन ही मन बात करी और गुस्सा किया कि,है भगवान ये तो आपके मंदिर की चालाकी है,जो मुझ जैसे भोले लोगो को बेवकूफ बनाते है।मैं तो इतने समय से यही समझती थी कि,आप सच मे फूल देते हो पर आज पता चल गया कि ये सब नकली था,और मैं मन ही मन भगवान से नाराज हो गई।
तभी अचानक आकाश से बड़े बड़े फूल आकर मेरी गोदी मे गिरते है।उनमें से एक बड़ा फूल पास ही बैठे मेरे स्वर्गवासी सासुजी मुझे देते है और कहते है कि देख राधा,ये फूल आकाश से गिर रहे है,यानी सीधे भगवान के घर से आ रहे है।ये सब असली है,सच्चे है।
उनकी बात सुनकर मेरी और शुभम की आंखों से आंसू बहने लगे।वहाँ बैठे सभी भक्तजन भी रोने लगते है।सभी साँवरिया सेठ की जय बोलते है और तभी मेरे सासुजी अचानक गायब हो जाते है और मेरा सपना भी टूट जाता है।
जब मेरा सपना टूटा और मेरी आँख खुली तो असली मे मेरी आंखे गीली थी और ,मैंने उठकर भगवान को प्रणाम किया और इतने सुंदर सपने के लिए उन्हें धन्यवाद दिया ।आज तक मुझे
जितने भी चमत्कारिक सपने आये,वो सभी सपने सुबह के 4 से 5 के बीच ही आये।और माना जाता है कि सुबह के सपनो का कोई न कोई महत्व जरूर होता है और मुझे वो सारे सपने ईश्वर के साथ होने का प्रमाण दे रहे थे।वो सत्य रूपी ईश्वर मेरे सत्य मे मेरे साथ था।एक पल के लिए भी ईश्वर ने मुझे नहीं छोड़ा और एक पल के लिए भी मैंने ईश्वर को नहीं छोड़ा।चाहे सुख आया हो चाहे दुःख, उनके नाम का स्मरण उठते बैठते,जागते सोते,चलते फिरते,हर समय चलता रहता था।यहाँ तक कि स्कूटी चलाते समय भी कई बार मैं उनकी स्मृतियों मे इस कदर खो जाती कि मुझे स्वयं को नहीं पता होता कि मैं किस रास्ते से घर तक आई हूं।कई बार तो मुझे लगता कि मेरा शरीर अलग है और उसके अंदर की आत्मा अलग है।सारे कार्य वो अप्रत्यक्ष आत्मा ही कर रही थी जिसे मैं अगर अपने अनुभवों से ईश्वर कहु तो भी कोई गलत नहीं।
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