मेरी शादी का वो दिन 4 मई 1998
मेरी शादी का वो दिन
हर इंसान को अपनी शादी हमेशा याद रहती है।
उस दिन का वातावरण,शहनाइयां,ढोल बाजे,मेहमानों का शोर गुल सब कुछ आंखों मे घूमता रहता है,जिसकी मधुर स्मृतियां जीवन भर हमारे साथ रहती है।मुझे भी अपनी शादी का वो दिन याद है,जिसकी झांकी का अनुभव मैं अपने ब्लॉग मे करने जा रही हु।वैसे तो मेरी शादी केवल एक दिन का मधुर सपना ही था बाकी उसके बाद के 20 साल एक कठोर दंड था जिसे मैंने अपने पूरे जीवन मे भुगता।फिर भी उस
एक दिन के मधुर सपने को मैं अपने शब्दो के द्वारा अभिव्यक्त कर रही हु।
4 मई 1998 का दिन था।मेरी शादी मेरे दादाजी के गावँ कड़िया मे हुई
थी,क्योंकि मैं घर मे सबसे बड़ी संतान थी,इसलिए पहली शादी पापा दादाजी के वहाँ करना चाहते थे,सो मम्मी ने 2 महीने पहले ही सारी तैयारिया कर ली थी।शादी का सारा सामान उदयपुर से ही तैयार करके ट्रक मे लेकर गावँ गए।पूरे 1 महीने के लिए हम सब गावँ मे ही रहे।मेरी दोनो भुआ और उनके बच्चे भी 1 महीने के लिए हमारे साथ रहने कड़िया आ गए। मेरे सभी cousin भाई बहनों ने मेरी शादी मे अपने एग्जाम भी कैंसिल कर दिए और अपना एक साल मेरी शादी मे खराब कर दिया था,पर किसी को भी इस बात का दुख नही था,क्योंकि पूरे परिवार मे पहली शादी जो थी,उत्साह बहुत था।
आजकल 2 दिन मे ही शादी के सारे कार्य हो जाते है और उस समय 1 महीने की पूरी शादी होती थी।1 महीने से ही गीत और नाच गाने चालू हो गए थे।उस समय गावँ मे एक रिवाज होता था,जिसमे गावँ के हर घर पर दुल्हन या दूल्हे को खाने के लिए आमंत्रित किया जाता था,जिसे वंदोला कहा जाता था।मुझे भी रोज बहुत से घरों से खाने के लिए निमंत्रण आते थे और न चाहते हुए भी मुझे सबके यहाँ खाने पर जाना ही पड़ता था।उस समय मेरे बी ए प्रथम वर्ष के एग्जाम थे,दिन भर लोगो के घर खाना खाने जाती और रात को अपनी पढ़ाई करती।एक दिन मे 10 या 15 लोगो के घर खाने के लिए जाना पड़ता था।मैं अपने सभी भाई बहनों को भी साथ मे लेकर जाती थी,क्योंकि इतनी जगह एक ही दिन मे खाना कैसे खाया जाए,पर रिवाज जो निभाना था।कई बार तो मैं इतना थक जाती कि मैं लोगो के हाथ जोड़ती कि मुझसे अब खाना नहीं खाया जाएगा,आप केवल आश्रीवाद दे दो।पर दादाजी और पापा के सामने किसकी चल सकती थी।पापा कहते थे कि ये तो लोगो का सम्मान है,हमे खुशी खुशी स्वीकार करना चाहिए।पापा की बात मानकर मैं पूरा दिन तैयार होकर एक घर से दूसरे घर तक खाने के लिए जाती रही।पर वो रिवाज खाने तक ही नहीं था बल्कि जो भी लोग खाना खिलाते वो गीत गाते हुए मुझे घर तक पहुँचाते थे।मैं आगे आगे चलती,वो सब ओरतें मेरे पीछे पीछे गीत गाती हुई आती थी उस समय मुझे इन सब रिवाजों से बहुत चिढ़ मचती थी,पर आज मैं उन पलों को याद करती हूं तो अश्रु बह जाते है।आज के समय मे न वो रिवाज है और न ही वैसा लोगो का प्यार है।
उस समय केवल पूड़ी और हलवा था,फिर भी अपार प्यार था,आज 10 पकवान है फिर भी उस प्यार की कमी है।
शादी के 11 दिन तक रोज हम सब परिवार के लोग पतवारी
माता की पूजा के लिए जाते थे
।परिवार की सब लड़किया सिर पर कलश लेकर आगे आगे चलती थी।उनके आगे एक ढोल वाला ढोल बजाते हुए चलता था।बहुत मजा आता था।पूरे गावँ के लोग साथ साथ आते थे।रास्ते मे सभी देवी देवताओं की जय जयकार बोलते थे।
इस तरह रोज के कार्यक्रम करते करते वो दिन भी आ गया,जिस दिन मेरी शादी थी।4 मई को मेरी शादी भी थी और उसी दिन मेरा हिंदी का पेपर भी था।मैं अपने भाई के साथ सुबह 8 बजे की बस से एग्जाम देने उदयपुर आई और 2 बजे की बस से वापस अपने गावँ कड़ियां आई।उसके बाद मेरी हल्दी पीठी हुई।फिर मुझे रोड़ी पूजने के लिए पास के एक खेत मे लेकर गए।मान्यता के अनुसार रोड़ी इसलिए पूजी जाती है कि दूल्हा या दुल्हन रोड़ी माता से अपने जैसा धैर्य मांगते है ताकि विवाह के नए जीवन मे हर परिस्थिति से लड़ने की शक्ति प्राप्त हो।रोड़ी एक ऐसी जगह है जहाँ गावँ के लोग गोबर इक्कठा करते थे।इस प्रकार सारे रस्म रिवाज हो गए और 4 बजे के करीब बारात भी पहुंच गई।बारात को एक स्कूल मे ठहराया गया।उसके बाद मैं तैयार हुई।मुझे पूरे घर मे तैयार होने के लिए एक छोटा सा कोना मिला जहाँ शादी का बहुत सारा सामान बिखरा पड़ा था।मैं जैसे तैसे उस छोटी सी जगह पर तैयार होने लगी कि अचानक लाइट चली गई।मेरी एक मासी की लड़की लालटेन और काँच लेकर मेरे सामने खड़ी रही और मैंने अपने आप को दुल्हन बनाया।
वरमाला डालने के बाद मुझे वापस से कमरे मे ले जाया गया और मेरी ड्रेस बदली गई।इस बार मुझे एक लाल रंग का साधारण सा साड़ी लहंगे का जोड़ा पहनाया गया और मुझे लंबा घूँघट डाल कर सिर पर कस कर मोड़ बांध दिया था।उसके बाद मेरे एक मामा आये और मुझे गोदी मे उठाकर मंडप मे बैठाया गया।
जब मामा ने मुझे गोदी लिया तो मुझे बहुत शर्म आ रही थी,पर यही रिवाज था।9 बजे तक फेरे हो गए और पाणिग्रहण संस्कार भी सम्पन्न हो गया।मुझे अपने दूल्हे के साथ बारातवास पहुंचाया गया।वहाँ से मेरे सभी रिश्तेदार मुझे वापस अपने घर ले आये,क्योकी विदाई अगले दिन 5 मई को थी।उस रात लाइट ने बहुत परेशान किया।पापा ने एक जनरेटर की भी व्यवस्था करी थी पर वो भी उस रात खराब हो गया।मेरे पापा पूरी रात उस जनरेटर को ठीक करने के लिए उलझते रहे लेकिन वो ठीक नहीं हुआ।अगले दिन सुबह फिर पानी के टैंकर ने भी बहुत परेशान किया।वो भी देर से पहुंचा, इसलिए पापा बहुत परेशान हो गए थे।उस समय गावँ मे पानी की बहुत किल्लत थी।इस तरह बहुत सी परेशानियों से गुजर कर पापा ने मेरी शादी करवाई।लेकिन जहाँ परेशानियां थी तो वहाँ छोटी छोटी खुशियां भी थी।5 मई को 11 बजे कलश यात्रा निकाली गई
जिसमें 500 औरते कलश लेकर बेंड बाजो के साथ चलती रही और इतना भव्य वो नजारा था कि पूरे गावँ मे वो कई सालों के लिए एक यादगार दिन बन गया।उसके बाद सभी ने खाना खाया और करीबन 3 बजे मायरे की रस्म हुई।मेरे नाना नानी ने बहुत ही खुशी से मायरा भरा।सबकी आंखों मे प्रेम के आंसू थे और सब उस मायरे मे भावविभोर हो रहे थे।मायरे का क्षण ही ऐसा होता है,हर कोई रोने लग जाता है।
उसके बाद 5 बजे मेरी विदाई हुई।सभी बहुत रोये।सबसे ज्यादा मेरा भाई रोया।मेरी मासी ने बहुत मुश्किल से उसे चुप कराया।मेरे पापा जो अब तक मुझे डांटते ही रहते थे और इतने मजबूत थे,वो भी आज रो रहे थे।मैं भी हर उस पल को याद कर रही थी जो मैंने अपने भाई बहनों के साथ गुजारे।समय इतना जल्दी निकल जायेगा,पता नहीं था।2 महीने से जिस शादी की तैयारी हो रही थी,एक पल मे ही वो दिन आज समापन की तरफ आ गया था।अत्यंत भावविभूर मन ने मेरे गले को जैसे रोक ही लिया था।
मैं कब सुसराल की गाड़ी मे बैठा दी गई ,मुझे कुछ पता नहीं था,जैसे कुछ समय के लिए मेरी चेतना ही चली गई हो।
आज भी मेरी शादी के वो पल याद करती हूं तो वो सारे दृश्य आंखों के सामने आज भी चलायमान हो जाते है।उसके बाद ऐसी शादी मैने फिर कभी नहीं देखी,क्योकी समय के साथ सब कुछ बदल गया।वो रिवाज,वो प्यार,वो लोग,वो अभावग्रस्त जीवन।
इसलिए कहते है कि गया समय कभी लौटकर नहीं आता।हर दिन अपने उस दिन के लिए ही याद बनकर रह जाता है,पर वैसा ही वापस कभी दुबारा नहीं होता।
फूल के मिटने के बाद केवल उसकी खुशबू ही जिंदा रह सकती है।यही सत्य है।
बहुत अच्छा वर्णन
ReplyDeleteNiec very nice didi
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