कोरोना और जीवन का सच
कोरोना वायरस और जीवन का सच
एक गीत मैंने कई बार सुना और मैं गाती भी रहती हूं कि समय को भरोसों कोनी, कद पलटी मार जावे।
आज गीतों की ये पंक्तियां अपनी आंखों के सामने सच होते हुए देख रही हु।
इस समय को देखते हुए मुझे मेरे बचपन की एक बात याद आ गई।मै जब 6 या 7 साल की थी तब मेरे नाना जी कहा करते थे कि बेटा ,ऐसा कल युग आएगा कि लोगो मे बीमारियां बढ़ेगी और बीमारियां भी ऐसी आएगी कि डॉक्टर के पास भी उसका इलाज नहीं मिलेगा।इंसान ही इंसान से डरेगा।उस समय मैं छोटी थी तो उनकी ये बातें समझ नहीं आती थी लेकिन आज जो बीमारी का प्रकोप मैं देख रही हु,वो वैसी ही बीमारी है जो स्वयं मेरे नानाजी ने कही थी शायद उनको पूर्वानुभव हो गया था।आज वाकई मे इंसान इंसान से डर ही रहा है।
आज इस कोरोना की वजह से हर वर्ग परेशान हो गया है।प्रकृति जब वार करती है तो वो किसी को नहीं छोड़ती है।चाहे वो गरीब हो या अमीर।
आज हर इंसान की अपनी एक अलग ही परेशानी है।गरीब की अपनी परेशानी है,अमीर की अपनी परेशानी है।लेकिन इन दोनों वर्गों के बीच जो मध्यवर्गीय परिवार से है,उनकी परेशानी बहुत ही अलग है,क्योंकि एक गरीब किसी से मदद लेकर अपना काम चला सकता है,सरकार से मिली मदद का फायदा ले सकता है।एक अमीर अपने बैंक बैलेंस से अपना काम चला सकता है लेकिन एक मध्यवर्गीय की ऐसी स्थिति है कि न तो वो सरकार की दी हुई मदद ले सकता है,न वो किसी से मांग सकता है और न ही उसके पास बैंक बेलेन्स होता है ।एक मध्यवर्गीय रोज कंमाता है और अपनी रोज की कमाई को वो अपने परिवार को मेंटेन रखने मे ही खर्च कर देता है।कई मध्यवर्गीय लोग बैंक लोन पर ही अपने बड़े कार्य करते है।कई लोग किराये के मकान मे रहते है ।ऐसी परिस्थिति मे ये लोग न अपनी समस्या किसी को कह सकते है और न ही उसका कोई उपाय निकाल पा रहा है।
दूसरी तरफ हम विचार करे तो आज का जीवन केवल खाने पीने तक ही रह गया है।आज इंसान को खाने के अलावा किसी पर खर्च नहीं करना है।इससे एक बात का अंदाजा लगता है कि इंसान का असली खर्चा तो केवल खाने का है।बाकी के सारे खर्चे केवल आधुनिकता को मेंटेन करने के लिए ही होते है।आज पेट्रोल का खर्चा,बाहर खाने का खर्चा,त्योहारों का खर्चा,फैशन का खर्चा, सिनेमाघरो का खर्चा, सब बंद हो गए है।
कहते है अति हर चीज की बुरी होती है।आधुनिकता के इस युग ने इंसान को इतना दिखावटी बना दिया था कि हर कोई दिखावे के चक्कर मे परेशान था।
चाहे शादी ब्याह हो या किसी की मृत्यु, लोगो को समाज मे दिखाने के लिए कर्ज करके भी काम करने पड़ते थे।
मैंने अपने जीवन मे इस तरह की कई बातें सुनी कि कोई मृत्यु भोज के लिए कर्ज ले लेते है तो कोई आधुनिक शादी के लिए कर्जा कर लेते है।उस समय तो वो जोश जोश मे इधर उधर से मांग कर काम कर लेते है।लेकिन जब उसी कर्जे को वो बाद मे चुकाते है तो उनके पसीने छूट जाते है।
दूसरी तरफ अगर हम अमीर की बात करें तो दिखावे के चक्कर मे वो अपने जीवन भर की कमाई एक शादी मे ही खर्च कर देते है
।मैं जब कई बार ऐसी शादियों मे जाती थी जहाँ कई तरह की खाने की वेरायटी होती थी।मिठाई की बात तो अलग,सब्जियां भी 10 तरह की बनती थी।यहाँ तक कि ठंडे मे भी 10 तरह की कोल्ड रिन होती थी।ये सब देखकर मेरा मन बहुत उदास होता था,इसलिए कि कई जगह पर लोगो के पास खाने का नहीं है और कई जगह पर इतना बनता है कि जिसका कोई मतलब नहीं था।मैं कभी भी ऐसी जगह पर संतुष्ट होकर खाना नहीं खा पाती थी,क्योंकि मेरा मन ऐसी ही बातों मे उलझा रहता था।मैं जब कभी अपने मन की बात किसी से करती तो सबका एक ही जवाब होता था कि ये सब तो करना ही पड़ता है।
कई बार जब मैं लोगो को शराब पीकर घर का माहौल खराब करते देखती तो भी मैं बहुत खिन्न रहती थी।कई लोग सड़क पर खड़े खड़े तम्बाकू को ऐसे शान से खाते थे जैसे वो कोई अच्छा काम कर रहे है।
एक दिन की बात है,मैं किसी किराना की दुकान से घर का कुछ सामान ले रही थी,
तभी उस दुकान पर एक 16 या 17 साल का लड़का सिगरेट लेने आया।मुझे उस बच्चे को देखकर उसके माता पिता का विचार आया और मैंने तुरंत उस दुकान वाले को डांटा कि इतने छोटे बच्चे को आप सिगरेट देकर कितना गलत कर रहे हो,पर उस दुकान वाले ने हंस कर बात को टाल दी और कहा कि मेरा काम है सामान बेचना।मैं क्यों किसी को मना करू।
उस दिन भी मैं पूरा दिन बहुत परेशान थी।जब तरह तरह की गलत बातों को देखकर मेरा मन उलझा रहता तो मैं मन ही मन ईश्वर से यही कहती कि क्या ये सब गलत चीजे बंद नहीं हो सकती।तम्बाकू और शराब जब इतनी गलत है तो क्यों बिकती है ये बाजारों मे।
जब फैशन मे आदमी इतना अंधा हो गया है कि वो न चाहते हुए भी दिखावे के लिए मजबूर हो जाता है तो फिर आखिर कब होगी इन अनावश्यक चीजो पर रोक।
प्रकति के साथ आये दिन लोग खिलवाड़ करते है।जहाँ जरूरत नहीं है वहाँ भी एयर कंडीशनर लगे हुए है।घर मे ज्यादा से ज्यादा फर्नीचर लगाने के लिए निरंतर पेड़ो की कटाई हो रही है
।दिवाली जैसे पावन त्यौहार पर पटाखे जैसी चीजों का उपयोग करके ईश्वर का अपमान ही तो कर रहा है इंसान।
प्रकति किसी की निजी संपत्ति नहीं है,इस पर हर प्राणी का अधिकार है,लेकिन मनुष्यो ने इसे अपनी ही सम्पति मानकर मनमाने ढंग से इसका उपयोग किया है।
मैं कई सालों से अनेक प्रश्नों के जाल मे थी,आज इस कोरोना ने मेरे कई प्रश्नों का उत्तर दे दिया है।ईश्वर इंसान को बहुत मोके देता है सुधरने का।लेकिन जब इंसान उसके दिए हुए संकेत को नहीं समझ पाता है तो फिर भगवान उसे अपने ढंग से कैसे समझाता है,वो आज मैं अपनी आंखों से देख रही हु।
तभी आज मंदिरों तक के दरवाजे बंद हो गए है।प्रकति जब अपना रौद्र रूप दिखाती है तो फिर कोई नहीं बचता।बुरे के साथ अच्छे भी उसका शिकार हो जाते है।आज प्रकति कोरोना रूपी राक्षस के द्वारा अपना क्रोध दिखा रही है।
महादेव जब अपना तीसरा नेत्र खोलते है तो विनाश ही विनाश होता है।अब इसे कैसे रोका जाए,कोई नहीं जानता।कितने लोगों पर इस क्रोध का असर पड़ेगा कोई नहीं जानता।
ये वो युग आया है,जहाँ चारो तरफ प्रकृति एक ही बात कह रही है कि,है इंसानों अब बदल जाओ।बहुत हो गया प्रकृति से छेड़छाड़।अब थम जाओ।और वाकई मे आने वाले समय मे सबको अपनी गेर जरूरी आवश्यकताओं पर रोक लगानी ही पड़ेगी।यही युग की मांग है।
अब आने वाले समय मे जो भी इस युद्ध के बाद बच जाएगा,उनके लिए एक नया जन्म होगा।नई बाते होगी।नए अवसर होंगे।नए तरीके होंगे,नए नियम होंगे।
सब कुछ बदला हुआ होगा,वैसे ही जैसे किसी तूफान के थमने के बाद होता है।
बस इस युद्ध मे बचने वाले को अब प्रकृति को बचाना है।
हम किसी भी चीज का प्रयोग उसकी आवश्यकता से ज्यादा न करें।अगर हर इंसान ईमानदारी से अपने अपने कर्तव्य का पालन करेगा तो कल युग मे जीना आसान हो जाएगा,वरना वो दिन दूर नहीं होगा जब धीरे धीरे पृथ्वी का नाश हो जाएगा।
चाहे दुनिया मे इंसान विकास करके कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो जाये,उस एक शक्ति से कोई नहीं जीत सकता ,और वो है परमात्मा की शक्ति।उससे जीतने का एक ही उपाय है उसकी दी हुई हर चीज का सम्मान किया जाए।अर्थात संतुलन।न ज्यादा और न बहुत कम।
जो संतुलन मे जीता है,उसका जीवन ही सार्थक है बाकी सब निरर्थक है।
समय बड़ा बलवान है।
बहुत सही बात लिखी ।एकदम सच ।
ReplyDeleteकोरोना में मध्यम परिवार ही सबसे ज्यादा तकलीफ में है ।
जय श्री कृष्ण,thankyou
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