भक्ति की पराकाष्ठा- बालक ध्रुव की कहानी
जय श्री कृष्ण
मैं अपने ब्लॉग मेरा सच मे अब कुछ सच्ची प्रभु भक्ति की कहानियां लिखने जा रही हु।मेरा सच ब्लॉग मे मैं अपनी आत्मकथा के अलावा कुछ महान लोगो की कहानियों से भी आपको परिचित करवाउंगी जो सत्य पर ही आधारित है।इसलिए मेरे पोस्ट पढ़ते रहिये-
बालक ध्रुव
सृष्टि के प्रथम पुरुष मनु और प्रथम स्त्री सतरूपा थी।
जिनके पुत्र राजा उत्तानपाद हुए।राजा उत्तानपाद के दो रानिया थी।बड़ी रानी का नाम सुनीति था और छोटी रानी का नाम सुरुचि था।सुनीति और सुरुचि का अपने नाम के अनुसार ही आचरण था।सुनीति सब गुणों से युक्त,सत्य,धर्म और नीति का पालन करने वाली थी ,उसके विपरीत सुरुचि जिद्दी,अहंकारी,और ईर्ष्यालु स्वभाव की थी ,फिर भी राजा उत्तानपाद सुरुचि को ही प्रेम करते थे।सुनीति को अपने पति का प्रेम न मिलने के कारण वो अपने आप को बहुत अकेला महसूस करती थी,इसलिए वो अपना ज्यादा समय प्रभु भक्ति और भजन मे ही लगाती थी।कुछ समय बाद दोनों रानियों से एक एक पुत्र हुआ।बड़ी रानी के पुत्र का नाम ध्रुव और छोटी रानी के पुत्र का नाम उत्तम था।
एक दिन ध्रुव अपने पिता उत्तानपाद की गोदी मे बैठा था तभी छोटी रानी सुरुचि ने आकर ध्रुव को अपने पिता की गोदी से उतार दिया और उस नन्हे से बालक ध्रुव को अपमानित करके ये कहा कि,इस पिता की गोदी मे केवल मेरा पुत्र उत्तम ही बैठेगा।
अगर तुझे पिता की गोदी मे बैठना है तो मेरी कोख से जन्म लेना।
छोटी माता के अपमानजनक वचन से ध्रुव को ठेस पहुंची और वो रोता हुआ अपनी माँ सुनीति के पास गया और कहा कि माँ मैं पिता की गोदी मे बैठना चाहता हु पर छोटी माता ने मुझे पिता की गोद से नीचे उतार दिया।ध्रुव की व्यथा देखकर माता सुनीति ने अपने पुत्र से कहा कि अगर तुझे पिता की गोदी चाहिए तो उस परम पिता की गोदी ढूंढ जिस पर से तुझे कोई नहीं उतार सके।माता सुनीति ने अपने नाम के स्वभाववश नीतिसंगत बात कह दी।ध्रुव ने बड़ी चंचलता और भोलेपन से अपनी माँ की तरफ देखा और बोला कि माँ!वो परमपिता कहाँ मिलेगा।माता सुनीति ने कहा कि जंगल मे मिलेगा।
माता सुनीति का इतना कहना हुआ कि ध्रुव तुरंत वहाँ से जंगल की ओर रवाना हो गया।माता ने अपने पुत्र को सत्य की राह दिखाकर अपने मातृत्व का बलिदान दे दिया और पुत्र मोह को छोड़ दिया।
जब जब सत्य का रास्ता हमारी राह देखता है तब तब सुरुचि जैसी माता आलोचना बनकर हमे उस मार्ग की तरफ जाने के लिए विवश कर देती है।सही राह पर जाने के लिए आत्मसम्मान को ठेस पहुंचनी बहुत जरूरी होती है क्योंकि जब तक आत्मसम्मान पर वार नहीं होता,तब तक इंसान इस मोहजाल से छूट नहीं सकता और जब तक मोहजाल नहीं छूटेगा,उन्नन्ति का रास्ता नहीं मिलेगा,फिर चाहे वो उन्नति आर्थिक हो,मानसिक हो या आद्यात्मिक हो।ये किसी भी मंजिल तक पहुंचने का कटु सत्य है।
इस प्रकार ध्रुव नंगे पांव उस परम सत्य को खोजने अपनी तेज चाल से चलता गया।
रास्ते मे श्री नारद मुनि मिले और ध्रुव को पूछा कि है बालक!तुम अकेले इस घने जंगल मे कहाँ जा रहे हो?बालक ध्रुव ने कहा कि परमपिता को ढूंढने जा रहा हु।इस पर नारद मुनि ने ध्रुव को समझाया कि अभी तुम बहुत छोटे हो।तुम्हारा काम बालको के साथ खेलना है।लेकिन ध्रुव की हट इस ज्ञान से कई परे थी,उसको तो हर हाल मे परम पिता के दर्शन करने थे।नारद मुनि उसकी इस भक्तिमय प्रेम पिपासा को देखकर प्रसन्नचित हो गए और उन्होंने ध्रुव को ॐ भगवते वासुदेवाय का मंत्र दिया।
जब लक्ष्य निश्चित होता है तब दुनिया की कोई सलाह या ताकत उसे लक्ष्य तक पहुंचने के लिए रोक नहीं सकती और यही कारण था कि नारद मुनि भी उसे रोक नही सके बल्कि उसकी लगन के आगे नतमस्तक होकर उसे मार्ग दिखाना पड़ा।
इस तरह नारदमुनि से मंत्र पाकर ध्रुव ने बिना कुछ खाये 6 महीने तक एक पाँव पर खड़े रहकर ॐ नमो भगवते वासुदेवाय का जाप किया।
उसकी कठिन तपस्या से देवताओ के लोक भी हिलने लगे और समस्त ब्रह्मांड मे भूचाल आने लगा तब भगवान विष्णु ने ध्रुव को दर्शन दिए और उसे अपनी गोद मे बिठाकर पिता का दुलार दिया।भगवान ने उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर उसे ध्रुव तारे की विशेष उपाधि दी जो संसार मे निरंतर चमकता रहा।
इस प्रकार मात्र 7 वर्ष मे ही ध्रुव ने भगवान को पा लिया था।
उसके बाद ध्रुव के माता पिता उसे सम्मान सहित अपने राज्य लेकर आये और उसके बाद ध्रुव ने कई वर्षों तक राज्य किया और अंत मे संसार को छोड़कर ध्रुव तारा बना जो मोक्ष का ही प्रतीक है।
सबसे कम उम्र मे भगवान की भक्ति करने वाले संसार के एकमात्र बालक ध्रुव थे जिनका नाम युगों युगों तक संसार लेता आ रहा है।
विशेष- शास्त्रानुसार उत्तानपाद का अर्थ होता है जिसके पाँव ऊपर हो और सिर नीचा हो।संसार का प्रत्येक मानव उत्तानपाद ही है क्योंकि वो अपनी माँ की गर्भ मे पाँव ऊपर और सिर नीचे की और किये हुए ही रहता है।और प्रत्येक मानव रूपी उत्तानपाद की दो रानिया होती है।एक सुनीति और दूसरी सुरुचि अर्थात हमारी बुद्धि का नाम सुनीति है और हमारे मन का नाम सुरुचि है।जो इंसान अपने जीवन मे सुनीति का प्रयोग करता है उसे ध्रुव प्राप्त होता है,ध्रुव का अर्थ है अटल,जो कभी नहीं मिटता।
और जो सुरुचि नामक मन का प्रयोग करता है उसे उत्तम रूपी पुत्र की प्राप्ति तो होती है, पर वो अटल या स्थिर नहीं होता,कभी भी मिट सकता है।
ईश्वर ने इस संसार को ध्रुव की कहानी के माध्य्म से मानव जीवन के मूल्यों का गूढ़ रहस्य समझाया है।
सत्यमेव जयते
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