भक्त प्रहलाद - संस्कारो का प्रभाव
भक्त प्रहलाद
पुराणों के अनुसार महर्षि कश्यप की पत्नी दिति के गर्भ से दो राक्षसो का जन्म हुआ।जिनका नाम हिरणकश्यप और हिरण्याक्ष था।हिरणकश्यप के पुत्र प्रहलाद हुए।एक बार हिरण्यकश्यप ने देवताओं को प्रसन्न करने के लिए घोर तप किया।
जिस समय हिरणकश्यप तपस्या के लिए गया हुआ था,उस समय उसकी पत्नी कयाधु गर्भ से थी।उसकी तपस्या से देवराज इंद्र भयभीत हो गए और उन्होंने पीछे से उसकी पत्नी कयाधु का हरण कर लिया।जब इंद्र देव कयाधु को अपने विमान मे बंदी बनाकर ले जा रहे थे तब महर्षि नारद ने उनका रास्ता रोका और इंद्र को कहा कि,एक गर्भवती स्त्री का हरण करना तुम्हें शोभा नहीं देता।महर्षि नारद ने कयाधु को इंद्र से छुड़ाकर अपने आश्रम मे ले आये और यहीं से शुरू होती है,भक्त प्रहलाद की कहानी-
कहते है स्त्री के गर्भावस्था मे जैसा माहौल उसको मिलता है,उसके बच्चे पर वैसा ही प्रभाव पड़ता है।और यही कारण था कि एक दैत्य कुल की स्त्री को जब नारद जी जैसे हरि भक्त का सानिध्य प्राप्त हुआ तो कयाधु के उदर से एक और हरी भक्त का ही जन्म हुआ,जिसका नाम प्रहलाद रखा गया।प्रहलाद को माता के गर्भ से ही भक्ति की शिक्षा मिल गई थी
,इसलिए वो थोड़े बड़े हुए तो केवल हरि नाम का ही सुमिरन किया करते थे।कुछ वर्षों बाद जब हिरणकश्यप की तपस्या पूरी हुई और उसने ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर वरदान प्राप्त कर लिया तब वो अपनी पत्नी कयाधु और अपने पुत्र प्रह्लाद को नारद जी के आश्रम से वापस अपने महल मे लेकर आया।हिरणकश्यप ने प्रहलाद की शिक्षा के लिए उसे अपने दैत्य गुरु शुक्राचार्य के पास भेजा।लेकिन प्रहलाद कोई भी दैत्य शिक्षा ग्रहण नहीं कर पा रहे थे और केवल हरि नाम का ही सुमिरन करते थे।जब इस बात का पता हिरण्यकश्यप को पता चला तो उसने अपने पुत्र को समझाया कि,मैं ही भगवान हु और मेरे राज्य मे मेरी ही पूजा होती है।तू विष्णु का नाम लेना बंद कर और मेरी भक्ति कर।तब प्रहलाद ने कहा कि,पिताजी!इस पूरे संसार मे पूजने योग्य एक ही है वो है श्री हरि।उससे बड़ा इस संसार मे और कोई नहीं है
।प्रहलाद ने अपने पिता को विष्णु भक्ति के लिए आग्रह किया तो ये बात सुनकर हिरणकश्यप बहुत भड़क गया और उसके बाद वो अपने पुत्र को अपना दुश्मन समझने लगा।हिरणकश्यप ने तरह तरह से प्रहलाद को यातनाएं दी,लेकिन हर बार श्री नारायण किसी न किसी रूप मे आकर उसे बचा लेते थे।एक दिन हिरणकश्यप ने प्रहलाद को अपनी बहन होलिका की गोद मे बैठाकर आग मे बैठा दिया,क्योंकि होलिका को ये वरदान प्राप्त था कि वो आग मे कभी जलेगी नहीं।
लेकिन विधाता की लीला ही अपरम्पार है।किसी भी वरदान का दुरुपयोग करने पर वो ही वरदान इंसान को नष्ट भी कर सकता है।ईश्वर की ऐसी लीला हुई कि प्रहलाद तो बच गया और होलिका हमेशा के लिए जल गई।उसी होलिका की याद मे होली का त्यौहार मनाते है,जिसमें बुराइयों को जलाने का संकेत है।होली का त्योहार संसार मे एक प्रेरणा लेकर आता है कि जीवन मे कभी किसी का बुरा नहीं करना है।प्रकति का ये नियम है कि जो हम दूसरों को देंगे वो ही हमारे पास लौटकर आएगा ,ठीक वैसे ही जैसे होलिका ने प्रह्लाद को मारने का प्रयास किया लेकिन पहले वो ही भस्म हो गई।
इस प्रकार प्रहलाद हर बार ईश्वर की कृपा से बच जाता था,इससे परेशान होकर एक दिन हिरणकश्यप ने प्रहलाद को बोला कि,कहाँ है तेरा भगवान?
प्रह्लाद ने सरल शब्दों मे कहा कि पिताजी वो तो कण कण मे है,सर्वत्र है।हिरणकश्यप फिर क्रोध मे आ गया और पास मे खड़े खंबे की ओर इशारा करता हुआ बोला कि क्या तेरा भगवान इस खंबे मे है।
प्रह्लाद ने कहा,हां पिताजी वो सब जगह है।हिरण्यकश्यप ने अपने पूरे बल का प्रयोग करके खंबे पर प्रहार किया,और खंबे मे से श्री नारायण का भयानक नरसिंह रूप प्रकट हुआ और हिरणकश्यप को अपने नाखूनों से मार डाला।
इस तरह का कठोर वरदान मांग कर वो इतना अभिमानी हो गया था कि उसने देवताओ को भी परेशान कर रखा था,उसके इसी वरदान के कारण दूसरा कोई उसे मार नहीं सकता था ।भगवान ने उसी के वरदान स्वरूप उसे सांझ के समय बिना अस्त्र शस्त्र के अपनी जंघा पर ,घर और बाहर के मध्य स्थान दहलीज पर उसे मारा।भगवान ने ब्रह्मा जी के वरदान का भी मान रखा और भक्त प्रह्लाद की भक्ति का भी।
दुनिया का कोई ऐसा कार्य नहीं या कोई ऐसी समस्या नहीं जिसका हल उस सर्वेश्वर भगवान विष्णु के पास नहीं हो।सारे संसार मे उन्हीं की माया चलती है।अपनी माया के प्रभाव से वो सब कुछ कर सकते है।
इस प्रकार भगवान ने हिरणकश्यप जैसी शक्ति का अंत करके प्रहलाद को मुक्त करवाया और अपने भक्त की लाज रखी।
जब जब ये संसार भक्त को परेशान करता है तब तब वो दीनानाथ भक्त की लाज रखने इसी तरह आया करते है जैसे प्रहलाद के लिए आये थे।इसीलिए श्री हरि को भक्त वत्सल कहा जाता है।
भक्त वत्सल भगवान की जय
विशेष- प्रह्लाद दैत्य कुल मे जन्म लेने के बाद भी भगवान का भक्त कहलाया क्योंकि इंसान के जीवन पर उसके कुल का नहीं संस्कारो का प्रभाव पड़ता है।प्रह्लाद को नारद जी के आश्रम का संस्कारी वातावरण मिला जहाँ निरंतर भक्ति की गंगा बहती थी,उसी की प्रेरणा से एक दैत्य का पुत्र भक्त बना जिसका इतिहास साक्षी है।
संस्कार ही वो नींव है जो इंसान का निर्माण करते है।कुसंस्कार इंसान को गर्त की और ढकेलते है और सुसंस्कार इंसान को प्रगति की ओर ले जाते है।इतिहास मे कई ऐसे उदाहरण है जो संस्कारों की महत्ता को इंगित करते है,उनमें से ही एक भरत थे जो शकुंतला और दुष्यंत के बेटे थे जिनका पालन जंगलों मे शेरों के साथ रहकर हुआ और इसी वजह से वो एक शक्तिशाली राजा बने।
संस्कार ही निर्माण भी है और संस्कार ही संहार भी है।
सत्यमेव जयते
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