नारी शक्ति और उसका दर्द
यत्र नार्यस्तु पूजते
तत्र देवता वसते
हालांकि आज के युग मे नारी बहुत आगे बढ़ी है फिर भी इतिहास गवाह है कि नारियों का बहुत अपमान हुआ है।
सीता और मीरा इतिहास की ऐसी नारियां थी जो सच्चाई की मूरत थी फिर भी समाज के लोगो ने उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया।नारी की शक्ति को लोगों ने समझा ही नहीं है।
नारी वो शक्ति है जो अपने गर्भ से एक और नई शक्ति को जन्म देती है।नारी से ही समाज का निर्माण हुआ है।
हमारे शास्त्रों मे ऐसी कई नारियां थी जिनको देवताओं के आश्रीवाद से ही संतान की प्राप्ति हो गई।एक नारी मे इतनी शक्ति होती थी कि वो अकेली ही संतान प्राप्त कर सकती थी।
सावित्री जैसी नारी ने केवल अपने तपो बल से यमराज से अपने पति के प्राण वापस ले आई।एक पतिव्रता नारी हो सकती है ,पर एक पत्नीव्रता पुरुष नहीं हो सकता।इसी पतिव्रता के बल पर सीता एक छोटे से घास के टुकड़े के बल पर रावण से अपनी रक्षा करती थी।नारी मे इतनी शक्ति होती है कि वो एक घास के टुकड़े को अपना हथियार बना सकती है जबकि पुरुष बिना अस्त्र शस्त्र के किसी से नहीं लड़ सकता।
नारी से ही नर है और नारी से ही नारायण है।
एक आदमी अपने पुरुषार्थ से धन कमा सकता है,मकान बना सकता है पर एक आदमी अपने पुरुषार्थ से घर कभी नहीं बना सकता क्योंकि घर केवल स्त्री से ही बनता है।एक आदमी के बिना घर उतना सुना नहीं लगता जितना एक औरत के बिना लगता है।जिस घर मे कोई नारी न हो वो शमसान की तरह वीरान लगता है।जिस घर मे नारी न हो वहां किसी अतिथि का भी आना जाना नहीं होता है।एक अकेली औरत खुश रह सकती है पर एक अकेला पुरुष कभी खुश नहीं रह सकता।नारी घर की शोभा है,फिर चाहे वो माँ हो,बहन हो या पत्नी।नारी से घर महकता है,नारी से घर गूंजता है।नारी से ही गीत है,नारी से ही संगीत है।नारी से ही प्रेम है नारी से ही सम्मान है।नारी ही त्याग है नारी ही घर की आत्मा है।
एक आदमी की जब पत्नी मर जाती है तो वो बिखर जाता है,टूट जाता है।उसमें उतनी ताकत नहीं होती कि वो अपने बच्चों को जीवन भर अकेले पाल सके और इसीलिए वो जल्द ही दूसरा विवाह कर लेता है परंतु एक औरत मे इतनी ताकत होती है कि वो अपने पति के मरने के बाद भी अपने बच्चों को जीवन भर अकेले पाल सकती है।
एक औरत आदमी के सारे कार्य कर सकती है लेकिन एक आदमी औरत के सारे कार्य नहीं कर सकता।
एक नारी दोहरी ज़िमेदारी निभा सकती है पर एक पुरुष ऐसा नहीं कर सकता।
एक पुरुष घर का पालन पोषण करने पर अभिमानी हो सकता है पर एक नारी घर के सारे कर्तव्य निभाकर भी सरल ही बनी रहती है।
पर नारी का ये दुर्भाग्य रहा है कि इनके इस त्याग,प्रेम और समपर्ण को कभी कोई नहीं संहारता।जब एक पुरुष अपने व्यापार मे ,नोकरी मे उन्नति करता है तो सब जगह उसकी प्रशंसा होती है,उनका सम्मान होता है,लेकिन एक नारी बरसों से अपने घर के लिए कितना कुछ करती है,पर न कोई उनकी प्रशंसा करने वाला होता है,न कोई उन्हें सम्मान देने वाला होता है।
मैंने अपने जीवन मे कई नारियों की इस पीड़ा को महसूस किया ।भले ही आज नारी ने शिक्षा के क्षेत्र मे बहुत उन्नति करी है पर फिर भी आगे बढ़ने का अवसर सबको नहीं मिल पाता।आज भी कई नारियां अपने घरों मे इस बात के लिए कुंठित है कि वो कुछ करना चाहती थी पर उन्हें अवसर नहीं मिला।नारी ने अपना जीवन अपने बच्चों और परिवार के लिए कुर्बान कर दिया लेकिन फिर भी आज भी उन्हे गुलाम ही समझा जाता है।
मै जब कई औरतों के दर्द को सुनती हु तो बहुत तकलीफ होती है कि विकास के इस दौर मे भी पुरुषों की मानसिकता नहीं बदली।आज भी कई पुरुष अपनी चड्डी भी अपनी पत्नी से धुलवाते है,इसलिए नहीं कि वो धो नहीं सकते,इसलिए कि कहीं न कहीं उनकी ये मानसिकता रही है कि औरत पुरुषों के
लिए ही बनी है और पति का हर कार्य करना पत्नी का धर्म है।कई आदमी शराब ,तम्बाकू और गुटखा खाकर शान से जीते है,क्योंकि उनमें एक पुरुष होने का अभिमान होता है कि जो कुछ भी वो करेंगे ,कोई उन्हें रोक नहीं सकता।अगर शराब,तम्बाकू और सिगरेट का सेवन औरते करने लगे तो आदमी को कैसा महसूस होगा,इसका अंदाजा हम लगा सकते है।एक आदमी औरत के अंदर कोई अवगुण नहीं चाहता तो एक औरत बरसों से आदमी के कितने अवगुणों को बर्दाश्त करके चलती है,इस बारे मे शायद कभी पुरुषों ने सोचा भी नहीं होगा,अगर सोचा होता तो शायद आज कहीं शराब,सिगरेट और तंबाकू की दुकानें नहीं होती।
आदमी ने अपने अभिमान मे आकर हमेशा से ही मनमानी करी है,जो नारी जाती का अपमान है।कभी कभी जब मैं औरतों की ऐसी ऐसी दास्ताँ सुनती हु तो ह्रदय द्रवित हो जाता है कि जो औरते गृहणियां बनकर अपने घर की चार दीवारी मे कैद होती है,उन पर भी शक किया जाता है।उनके पति और सुसराल वाले उनके चरित्र पर भी संदेह करते है जो घर से कहीं बाहर नहीं जाती तो फिर उन औरतों का क्या होता होगा जो बाहर निकलकर आगे बढ़ रही है।
युग बदल गया,तकनीकियां बदल गई,शिक्षा का विकास हो गया,पर आज भी इस संसार की मानसिकता नहीं बदली ।
बरसो से ये समाज नारी के चरित्र पर संदेह करता आ रहा है,आखिर कब तक नारी अपनी शुध्दता का प्रमाण देती रहेगी वो भी उन पुरुषों को जिनके खुद की चरित्रता का कोई प्रमाण नहीं।जिस दिन नारी पुरुषों की चरित्रता पर संदेह करने लगेगी तब घर घर नहीं रहेगा।
कई पति अपनी पत्नियों को आगे नहीं बढ़ने देते,उनकी प्रतिभा को दबाते है और इसका असर पड़ रहा है नई जनरेशन की लड़कियों पर।आज की लड़कियों को शादी मे कोई रुचि नहीं है,वो खुद के बल पर काम करके केवल पैसा कमाना चाहती है ताकि वो पुरुषों की इस गुलामी से आजाद रह सके।
अगर हर आदमी अपने घर की गृहणियों का सम्मान करें,उन्हें सहयोग करे और उनके कार्यो की समय समय पर प्रशंसा करे तो दुनिया की कोई नारी कुंठित नहीं होगी।नारी की असली प्रसन्नता उसके अंदर की खुशी है और जो उसे तभी मिल पाएगी जब उसके त्याग और प्यार को उचित सम्मान मिलेगा।
नारी और पुरुष दोनों एक दूसरे के पूरक है।जितना सम्मान पुरुष नारी से चाहता है अगर वो ही सम्मान नारी को मिल जाये तो फिर किसी प्राकतिक शक्ति को ये समझाने की जरूरत न पड़ेगी जो आज कोरोना ने समझाया है।
कई पति अपने अहंकार मे अक्सर पत्नियों को ये कहते थे कि तू दिन भर घर पर करती क्या है?आज प्रकति ने उन पुरुषों को उत्तर दे दिया है कि घर पर रहना क्या होता है।
प्रकति का ये स्वभाव है कि जो देंगे वो ही वापस हमारे पास लौट कर आएगा।इसलिए हर इंसान को एक दूसरे का सम्मान करना चाहिए और विशेष तौर से नारी को अपना साथी समझिये गुलाम नहीं।नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब कोई भी लड़की सुसराल जाना पसंद नहीं करेगी और एक दिन लड़को को शादी करके सुसराल भेजना पड़ जायेगा।
समय की कीमत को समझे।
नारी को उचित प्यार और सम्मान दे।
सत्यमेव जयते
बहुत अच्छा लिखा ।एकदम सच
ReplyDeleteजय श्री कृष्ण,thankyou
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