शनिदेव जी की कथा
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शनिदेव जी की कथा
एक बार की बात है
।नो ग्रह देवता की सभा चल रही थी।सभा मे एक बात से देवताओं मे बहस हो गई कि हम 9 ग्रह देवता मे से सबसे बड़ा कौन है सबने अपने अपने कार्य की महिमा बताकर अपने आप को ही बड़ा बताया।
सबसे पहले सूर्य भगवान बोले कि मैं ही पृथ्वी पर प्रकाश लाता हु,इसलिए सबसे बड़ा मैं ही हु।उसके बाद चंद्रमा जी बोले कि मैं सबको शीतलता देता हूं,इसलिए मैं बड़ा हु।फिर बुधवार जी बोले कि मैं बुद्धि का दाता हु और बुद्धि के बिना इंसान कोई काम नहीं कर सकता,अगर मैं किसी पर नाराज हो जाऊं तो उसके सारे कार्य उल्टे कर सकता हु।इस पर बृहस्पति बोले कि मैं तो गुरु हु और गुरु के बिना तो इंसान अपना कल्याण कर ही नहीं सकता,इसलिए मैं बड़ा हु।इस तरह शुक्र,राहु और केतु ने भी अपने आप को बड़ा बताया।अंत मे शनिदेव जी भी कहते है कि मैं सब देवताओ मे से बड़ा हु।इस पर सभी देवता शनिदेव जी से कहने लगे कि आपने ऐसा क्या कार्य किया जिससे आप अपने आप को बड़ा बता रहे हो।शनिदेव जी कहते है कि मैं जिस राशि पर चला जाता हूं,उसको बहुत परेशान करता हु,उसके रास्ते मे कठिनाइयों का जाल फैला देता हूं।और बड़े बड़े लोग मेरे नाम से कांपते है।शनिदेव की बात से जब कोई देवता संतुष्ट नहीं हुए तो सब मिलकर राजा इंद्र के पास गए और अपनी समस्या बताई।
राजा इंद्र उनकी समस्या सुनकर परेशान हो गए कि वो आखिर किस देवता को बड़ा बताए।सब अपने अपने कार्य से एक से एक महान थे।उन्होंने सोचा कि अगर एक को बड़ा बताऊंगा तो दूसरा नाराज हो जाएगा।इसलिए उन्होंने सभी देवताओं से कहा कि आपकी समस्या बड़ी गंभीर है,इसलिए आप पृथ्वी पर जाओ,वहाँ पर उज्जैन के राजा विक्रमादित्य है जो बहुत ही धर्म और सत्य पर चलने वाले है,वो आपका न्याय अवश्य करेंगे।राजा इंद्र की बात सुनकर सभी देवता राजा विक्रमादित्य के पास जाते है।राजा विक्रमादित्य देवताओ के आगमन से बहुत प्रसन्न होते है और उनका आदर सत्कार करते है।उसके बाद राजा विक्रमादित्य देवताओं से उनके आने का कारण पूछते है।देवताओं ने उन्हें अपनी पूरी बात बता दी और न्याय की मांग की।
राजा ने जब देवताओ की बात सुनी तो विचार मे पड़ गए कि अब इनका न्याय कैसे किया जाए,लेकिन क्योंकि वो एक धर्म परायण राजा थे और शरण मे आने वालों की समस्या का निवारण करना उनका धर्म था,इसलिए उन्होंने एक उपाय सोचा।उन्होंने 9 तरह के आसन मंगवाए,जो अलग अलग धातु से बने हुए थे,परंतु दिखने मे सब एक जैसे थे।राजा ने कहा कि जो देवता सोने के आसन पर होगा वो बड़ा माना जायेगा और जो लोहे की आसन पर होगा वो सबसे छोटा माना जायेगा।सबने तुरंत अपने अपने आसन पकड़ लिए और उस पर बैठ गए,लेकिन शनिदेव जी धीरे धीरे आये और अंत मे वो भी आसन पर बैठ गए
जब राजा ने उनके आसन का निरीक्षण किया तो सोने के आसन पर तो सूर्य भगवान थे और लोहे के आसन पर शनिदेव जी थे।राजा ने सभी देवताओं से कहा कि सबसे बड़े सूर्य देवता है और सबसे छोटे शनिदेव जी है।ये सुनकर शनिदेव जी को क्रोध आता है और वो राजा को कहते है कि ,तूने भरी सभा मे मुझे छोटा बताकर मेरा अपमान किया है और इसके लिए तुझे बहुत बड़ा दंड भुगतना पड़ेगा।राजा विक्रमादित्य अपने फैसले पर अडिग थे,उन्होंने कहा कि मैं रघुवंशी हु और रघुकुल मे सदा से ये रीति है कि हम एक बार जो कह देते है,वो कभी बदलते नहीं है।
रघुकुल रीति सदा से चली आई
प्राण जाए पर प्रण नहीं जाई।
राजा के इस कठोर निर्णय पर शनिदेव जी और भड़क गए,उन्होंने राजा को कहा कि
है राजा,तू इतना अभिमान कर रहा है और बार बार मुझे अपमानित कर रहा है।अब मैं तुझे बताऊंगा कि मैं छोटा हु या बड़ा हु।शनिदेव जी फिर कहते है कि मैं तुझे राजा से रंक बना दूंगा,अब भी अपना फैसला बदल दे।लेकिन वो भी सत्यवादी राजा थे,वो निर्भीक रहकर अपनी बात पर अटल रहे।यहीं से शुरू होती है राजा के सत्य की कठोर परीक्षा।जब जब सत्य के पालन के लिए कोई महान इंसान पैदा होता है तब तब शनिदेव जी इसी तरह की लीला करके उस इंसान के सत्य को परखने अवश्य आते है।
अब सभी देवी देवता भी वापस अपने धाम चले जाते है और राजा भी अपने कार्य मे व्यस्त हो जाते है और इस घटना को यहीं भूल जाते है।
कुछ समय के उपरांत एक दिन राजा के महल के बार कोई घोड़ा बेचने वाला व्यापारी आता है
,ये व्यापारी कोई और नहीं, शानिदेवजी ही थे,पर राजा उनको पहचान नहीं पाता है।राजा उन घोड़ो पर मुग्ध हो जाता है और वो उन्हें खरीदने के लिए महल से बाहर जाता है।उसी रात रानी को सपना आता है कि शनिदेव जी घोड़े बेचने आते है।वो अपने राजा से कहती है कि आप घोड़े लेने मत जाओ,ये घोड़े बेचने वाले शनिदेव जी है,जिनका आपने अपमान किया है।पर राजा को रानी की बात पर विश्वास नहीं हुआ और वो घोड़े लेने निकल गए।उनको एक ही घोड़ा पसंद आया जो हवा मे उड़ता था।राजा जैसे ही उस घोड़े पर बैठता है तो घोड़ा उड़ जाता है।राजा अपनी चाबुक से घोड़े के लगाम कसते है तो भी घोड़ा काबू मे नहीं आता है और उड़ता उड़ता महल के ऊपर से होकर गुजरता है
तब रानी महल की छत से अपने राजा को कहती है कि मैंने पहले ही कहा था कि आप घोड़े लेने मत जाओ।पर आपने मेरी बात नहीं सुनी।राजा ने कहा कि हमारे कर्म मे जो लिखा होता है,वो होकर ही रहता है।अब तो ये घोड़ा मुझे कहाँ ले जाएगा,मुझे भी नहीं पता।आपका और मेरा मिलना लिखा होगा तो मिलेंगे नहीं तो आप ये राज्य संभालना और अपना ध्यान रखना।राजा ने रानी से विदा ली और अपने आप को उस घोड़े के हवाले कर दिया।घोड़ा उड़ता उड़ता बहुत दूर तक चला गया।
एक घने जंगल मे आकर घोड़ा नीचे उतरा।राजा ने घोड़े को एक पेड़ से बांध दिया और स्वयं पानी की तलाश मे इधर उधर भटकने लगे।जब बहुत दूर तक भी पानी नहीं मिला तो राजा वापस उस स्थान पर आया जहाँ घोड़े को बांधा था लेकिन वहाँ घोड़ा नहीं होता है।राजा चारो तरफ घोड़े को ढूंढते है लेकिन घोड़ा नहीं मिलता है।
भूख और प्यास से बेहाल राजा बेहोश होकर घिर जाते है।शनिदेव जी दूर से देखते है और सोचते है कि अगर यहाँ इसको पानी नही पिलाया तो ये मर जायेगा,इसलिए शनिदेव जी स्वयं ही ग्वाल का वेश करके पानी का घड़ा लेकर आते है और उसे पानी पिलाकर उसका नाम और पता पूछते है।राजा ने सोचा कि अगर मैं अपने आप को उज्जैन का राजा बताऊंगा तो कोई विश्वास नहीं करेगा।इसलिए राजा उस ग्वाल को कहते है कि मेरा नाम विको है, मैं उज्जैन मे रहता हूं और मेरे देश मे इस साल बारिश नहीं हुई है,इसलिए मैं यहाँ नोकरी करने आया हु,लेकिन मेरा घोड़ा कही गायब हो गया है।क्या आपने मेरे घोड़े को देखा है।ग्वाल कहता है कि घोड़ा तो मैंने नहीं देखा परंतु आप बहुत दूर आ गए हो।उज्जैन नगर तो यहाँ से साढ़े तीन सौ कोस दूर है।राजा ने ग्वाल से कहा कि दूर तक आना करना तो भाग्य की बात है।विधाता जो करते है वो ही होता है,मेरे हाथ की बात नहीं है।अब आप मुझे आपके देश मे कहीं नोकरी दिला दो।
वो ग्वाल बने शनिदेव जी राजा को एक सेठ के यहां नोकरी दिला देते है और फिर वो ग्वाल वहाँ से गायब हो जाता है।राजा अपनी मूल पहचान भूलकर अपने आप को साधारण विको मानकर सेठ के यहाँ नोकरी करते है।सेठ के यहाँ नोकरी करने से सेठ की दुकान अच्छी चलने लगी तो सेठ भी विको से बहुत खुश था।परंतु एक दिन विको यानी राजा विक्रमादित्य उस सेठ के यहाँ खाना खा रहे थे तभी दीवार पर लटका हुआ सेठानी का हार खूंटी निगल रही थी।राजा ये सब देख रहे थे पर किसी को कुछ कह नहीं पा रहे थे।कुछ दिन बाद सेठानी ने हार पहनने के लिए जैसे ही खूंटी की ओर देखा तो हार गायब था।सेठानी समझ गई कि ये हार विको ने ही चुराया है।सेठानी ने सेठ जी से हार वाली बात बताई तो सेठ जी ने कहा कि विको चोरी करने जैसा आदमी नहीं है।लेकिन सेठानी नहीं मानी और सेठानी के आग्रह पर सेठ जी उस विको को राजा के पास ले जाते है।वहाँ ले जाकर कोतवाल के हाथों कोड़े बरसाते है,और फिर अंत मे विको के हाथ पैर कटवाकर नगर के बाहर फेंक देते है।
विक्रमादित्य इसी अवस्था मे बहुत दिनों तक नगर के बाहर पड़े रहते है।उनके टूटे हुए हाथ पैर पर मक्खियां घूमती रहती है जिससे उनको अत्यधिक पीड़ा होती है।
कुछ दिनों बाद एक घासी राम नाम का आदमी तेल बेचने जा रहा होता है
तो उसको विको पर दया आ जाती है और वो कुछ तेल विको के घाव पर उड़ेल देता है जिससे विको को उन मक्खियों से छुटकारा मिल जाता है तो दर्द मे थोड़ी राहत मिल जाती है।घासीराम जी को उस दिन तेल बेचने के लिए ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ता है बल्कि रास्ते मे ही उनका तेल बिक जाता है और उन्हें अच्छी कीमत मिल जाती है।वो घर जाकर अपनी पत्नी को बताते है कि उस चोर के घाव पर तेल डालने से हमे इतना मुनाफा हो गया है तो क्यों न हम उसको अपने घर ले आए।घासीराम की पत्नी भी विको चोर को घर लाने की हामी भर देती है।वो दोनों विको चोर को अपने घर ले आते है और उसको पुत्र की तरह रखते है।विको के हाथ पैर न होने से वो कुछ काम तो नहीं कर पाते है ,पर घासीराम के तेल की घाणी पर बैठकर बैल को अपने मुँह की आवाज से हांकते रहते थे
एक दिन आधी रात को जब वो तेल की घाणी पर बेल हांक रहे थे तो वो एक गीत गा रहे थे,जिसकी मधुर राग उसी गावँ के राजा की बेटी के कान तक जाती है तो वो उस राग पर मुग्ध हो जाती है और मन ही मन उस राग गाने वाले से प्रेम कर बैठती है।सुबह जब राजकुमारी को जगाने के लिए दासियां आती है तो वो गहरी नींद मे सो जाती है।पूरे महल के लोग उसे जगाते है पर वो नहीं जागती है।तब राजकुमारी के माता पिता राजकुमारी को कहते है कि,हमारी प्यारी राजकुमारी को किसने नाराज किया है।तब राजकुमारी उठ कर बैठ जाती है और बोलती है कि मुझे किसी ने नाराज नहीं किया है,मैंने तो आधी रात मे जो राग सुनी,उसकी मैं दीवानी हो गई हूं और जो कोई भी इस राग को गा रहा है,मैं उसी से विवाह करूँगी और मैं उससे मिलना चाहती हु।तब राजा पूरे नगर मे ऐलान करता है कि जो कोई भी उस राग गाने वाले को मेरे पास लाएगा,उसे इनाम दिया जाएगा।अगले दिन राजा के दरबारी राजा को बताते है कि वो आधी रात मे गाने वाला तो एक चोर है और घासीराम तेली के घर मे रहता है।तभी राजा उस तेली को दरबार मे बुलाते है और कहते है कि तुम्हारे घर मे जो चोर है उससे मेरी पुत्री का विवाह करना है।राजा की बात सुनकर तेली घबरा जाता है और वो राजा को कहता है कि जिस चोर की आप बात कर रहे हो,उसके तो हाथ पैर भी नहीं है, आप तो राजा हो और हम आपके दास है।ये विवाह कैसे हो सकता है।।राजा ने उस तेली से कहा कि जितना भी खर्चा होगा मेरे राज्य से ले जाना,पर शादी तो उसी चोर से ही होगी।राजा की बात सुनकर घासीराम घर जाकर सारी बात अपनी पत्नी और उस विको चोर को बताता है और प्रेम से शादी की तैयारिया करते है।
विको चोर बने विक्रमादित्य नियति के अधीन होकर चुपचाप सब कुछ देख रहे थेअगले दिन से उनकी हल्दी पीठी होने लगती है,
सभी सखिया मंगल गीत गाती हुई प्रेम से विको चोर की बारात लेकर राजा के वहाँ जाते है।सभी की आंखे इस दृश्य को देखकर स्तब्ध सी हो जाती है कि एक राजा की बेटी बिना हाथ पैर वाले एक चोर से शादी कर रही है।
पर विधाता की लीला सब देख रहे थे।
विको की बारात को दो चार दिन महल मे ही रुकवाते है।एक रात विको अपनी नई दुल्हन के साथ महल मे विश्राम कर रहे थे।राजकुमारी को नींद आ गई थी पर विक्रमादित्य मन ही मन शनिदेव जी को याद कर रहे थे और कह रहे थे कि है शनिदेव जी ये आपने क्या किया।मेरे 16 रानियां घर पर है,और 17 वी शादी करवा दी।मेरा आपने घर छुड़वाया,देश छुड़वाया,हाथ पैर कटवा दिए और यहाँ लाकर शादी करवा दी।इतना तो मैंने कोई बुरा नहीं किया जो आपने मुझे इतनी सजा दी।अगर ऐसे आप इंसानों को दुःख दोगे तो कोई आपको सपने मे भी याद नहीं करेगा।तभी शनिदेव जी प्रकट होते है और विक्रमादित्य को कहते है कि है सत्यवादी राजा,आप धन्य है।जितना भी मैंने आपको कष्ट दिया,आपने सहन किया।आपकी परीक्षा सफल हुई,अब अपने उज्जैन नगर चलो और अपना राज्य संभालो।शनिदेव जी ने उनके हाथ पैर वापस सही कर दिए और विक्रमादित्य को वचन दिया कि आज के बाद मैं किसी की भी इतनी कठोर परीक्षा नहीं लूंगा,क्योंकि कल युग मे इतना दुःख कोई सहन नहीं कर पायेगा,इसलिए मैं छाया मात्र ही बताऊंगा।ये कहकर शनिदेव जी अदृश्य हो जाते है और तभी राजकुमारी की नींद खुल जाती है और वो अपने पति विको को देखती है कि उनके हाथ पैर वापस आ जाते है।पूरे नगर मे इस बात की चर्चा हो जाती है कि विको चोर के हाथ पैर वापस आ गए है।
विको ने सबको बताया कि मैं उज्जैन का राजा विक्रमादित्य हु और मुझ पर शनिदेव जी रूठे थे,इसलिए मेरी ये दशा हो गई है।राजकुमारी उज्जैन की रानी बनकर बहुत खुश होती है ।विको के हाथ पैर आने की बात उन सेठ जी तक जाती है जिसने चोरी का इल्जाम लगाया था,तो वो बहुत डर जाते है और उसी समय सेठ जी और सेठानी जी विक्रमादित्य से माफी मांगने आते है।विक्रमादित्य उन्हें कहते है कि मैं किसी से नाराज नहीं हूं,मुझ पर ईश्वर रूठे थे,जिसके कारण ये सब हुआ।लेकिन सेठ जी विक्रमादित्य को कहते है कि अगर आप मुझसे नाराज नहीं है तो मेरी बेटी से आपको विवाह करना होगा।
सेठ जी के बार बार आग्रह करने पर विक्रमादित्य एक और शादी करने के लिये विवश हो जाते है और प्रेम से शादी करते है।अपनी दोनों रानियों के साथ जब विक्रमादित्य सेेठ जी के घर खाना खाते है
तो तभी दीवार पर लगी खूंटी से हार बाहर आता है और आकर विक्रमादित्य की थाली मे गिर जाता है।सेठ जी और सेठानी हाथ जोड़कर एक बार फिर से विक्रमादित्य से माफी मांगते है और सभी राजा विक्रमादित्य की जय जय कार बोलते है।राजा अपनी दोनों नई रानियों के साथ उज्जैन नगर जाते है और अपनी 18 रानियों के साथ राज्य संभालते है।उन्होंने कई जगह पर 9 ग्रह देवता के मंदिर बनवाये और अपने राज्य मे शनिदेव की पूजा लागू कर दी और तब से शनिदेव को ग्रहों मे सबसे श्रेष्ठ देवता माना गया।
शनिदेव जी न्याय के देवता के रूप मे सारे संसार मे पूजे जाने लगे।
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