आखिर क्यों?

आखिर क्यों?

आज एक प्रश्न बार बार मुझे परेशान कर रहा था कि आखिर सरकार ने शराब की दुकानें खुलवाकर कौनसा नीति संगत कार्य किया है।कई लोग कह रहे है कि सरकार के पास पैसा नहीं है तो कुछ तो करना पड़ेगा।लेकिन मेरा मन इन जवाबों से संतुष्ट नहीं हो पा रहा था।
एक तरफ तो रामायण हमें ये सिखाती है कि किसी भी परिस्थिति मे धर्म और नीति का साथ नहीं छोड़ना चाहिये।

भगवान राम हमें ये सिखाते है कि अधर्म का साथ देने से तो मरना अच्छा है,फिर क्यों इंसान  उनके आदर्शों को नहीं अपना पाता।
इंसान के धर्म परायण और सत्य की परीक्षा विपरीत समय मे ही होती है,और उस समय ही हमें ये आदर्श स्थापित करना होता है कि किसी भी परिस्थिति मे अनीति का साथ नहीं देना चाहिये।
इतिहास मे अनेक राजाओ ने अपने धर्म के पालन के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।राजा हरिश्चंद्र ने अपने सत्य पालन के लिए अपना सब कुछ बेच दिया

राम भगवान ने अपने धर्म पालन के लिए अपने सब सुखों का त्याग कर वनवासी बनकर रहे वो चाहते तो किसी की भी मदद लेकर 14 वर्ष काट सकते थे पर उन्होंने अपने आत्मसम्मान की रक्षा कष्ट सहन करके भी करी।
रावण के भाई विभीषण ने एक दैत्य कुल मे जन्म लेने के बाद भी अनीति का साथ नहीं दिया फिर उसी भारत मे रहकर हमारी सरकार किसी की रोटी का प्रबंध करने के लिए शराब जैसी अनीति का सहारा कैसे ले सकती है।इस शराब ने कितने लोगों के घर बर्बाद किये।इसी शराब के कारण कितनी ओरतो ने अत्याचार सहन किये है।आज कोरोना एक ऐसा  बहाना था जिससे इंसान की शराब छूट सकती थी लेकिन अफसोस कि ऐसा होने से पहले ही उन शराबियों की जीत हो गई।

शराब,तम्बाकू और सिगरेट ने लाखों लोगों के घर बर्बाद किये है,इन्हें तो जड़ समेत उखाड़ कर फेंक देना चाहिए।पर ये तीनो चीजें बंद नहीं होती है।
               आखिर क्यों?

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